Monday, May 25, 2020

कुछ अधूरा था अधूरा ही रह गया...

कुछ अधूरा था अधूरा ही रह गया
पूरा होता भी कैसे ?

आज अचानक उनका खत मिला
लिखा था अब खत न लिखना
बहुत सह चुका हूँ तुम्हें
आदतें अब तुम्हारी सही नही जाती
उसका कहना हुआ और हम बेज़ुबान हो गए
बस याद आ गयी तो वो पहली की बात
जिसमें कह दिया था मैने 
संभालना मुझे आसान नही 
टूट कर बिखरी हस्ती हूँ मैं
पुनः समिटना मेरा ठीक नही 
ये बात समझना जरूरी थी
तभी कहती हूँ मैं , 
रास्तों का एक होना ठीक नही 
छा गयी थी खामोशी ,उस वक़्त कुछ पल के लिए
टूटी भी जब तब जबाब उसका मिला
 संभाल लूंगा तुम्हें, समेट दूँगा इस बिखरन को
बस मेरे इजहार को हाँ करदो।
और आज भी यही सवाल ।
प्रियंका श्री
25।6।20

2 comments:

  1. बहुत खूब ... ऐसे सवालों के जवाब कहाँ होते हैं ...

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