Friday, October 9, 2020

बातें रोज़ की पार्ट 2

लगभग 7 महीने बाद आज रेस्टोरेंट में खाने गए थे । बीते महीनों तक या यूं कहें काफी समय तक या तो रेस्टोरेंट बन्द थे या खाने को घर तक के आगमन की सुविधा दे रहे थे। उस वक़्त तक महामारी का डर ज़ोरों पर था। इसलिए खाना घर का ही बेहतर होता है ऐसा चलन शुरू हो गया । अरे इसी सोच ने तो महिलायों को मास्टर सैफ तक बना दिया। 
इन सब को देखते हुए हम भी कुछ ऐसी ही जिंदगी जी रहे थे । और हर खाने की ख्वाहिश घर पर ही पूरी करने की कई बार कामयाब तो कई बार नाकामयाब कोशिशें ज़ारी रहती थी पर न तो कोरोना गया , न ही ख़्वाहिशें ख़त्म। तो अब बचता क्या? इसलिए इतने महीनों बाद सोच ही लिया कि चलो आज चलते है और स्वाद को मज़ा आजायेगा और परिस्थितियों का जायज़ा भी हो जाएगा। अब क्या करे दिमाग़ में पत्रकारिता घुसी ही कुछ ऐसी है तो चल दिये अपनी मंजिल की ओर । 
आखिर सफर ख़त्म हुआ और मंजिल सामने खड़ी थी , सफेद सूट , टोपी पहने लगभग 5.6 इंच की जिसने खुद की सुरक्षा के लिए मास्क और हाथों में ग्लब्स पहन रखे थे और किसी देवता की तरह उसके हाथों में सेनेटाइजर और ताप जांचने वाले यंत्र सुशोभित थे।
ये देखते ही थोड़ी जान में जान आयी कि पहला पड़ाव तो इन्होंने बड़ी ही सफाई से पार कर लिया । अब बारी थी अंदर जाने की पर उसके पहले ही मिला प्रसाद रूपी सेनेटाइजर और सुरक्षा के लिए ताप की जांच।
अंदर जाते ही आँखे ढूढ़ने लगी। अरे बाबा और किसे ,उन लोगों को जो रेस्टोरेंट की शोभा पहले ख़ूब बढ़ाते थे। अब कोई नही मुश्किल से एक दो लोग। और सुरक्षा के हर पुख्ता इन्तेजाम ।
और इस तरह आज का सफ़र जिसकी मंज़िल डोसा थी पूरी हुई।
~मीरांत
9/10/20
#corona
#safety
#रेस्टॉरेंट

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