Tuesday, March 30, 2021

कविता

बड़ी ही अजीब होती है ख़यालों की दुनियां
वास्तविकता से परे तो आभाषी में भी जीवंत सी
लाखों ख्वाहिशों में लिपटी सी
मन मे अलग उथलपुथल रख दे
बिना बात धकड़नों  के तीव्र वेग सी
आधारों से मुक्त, स्वच्छन्द सी
भटकता मन जब भी मुक्त होकर
निकलन पड़ता है दूर इससे कहीं
उलछनों और मेहनत की इस चार दिवारी में
मानों सुंदर किसी सपनें से दूर होकर
बैठा हो कोई धधकते उस ज्वालामुखी पर
असलियत मानों जहां सामने हो और उड़ने की चाह में
आग में लिपटे उन पंखों को दर्द में भी फड़फड़ाना है
जानते हो जैसे वे पंख जितने ऊपर आसमानों को
छूने को बेचैन होंगे ,उतना आसान होगा फैले उस समुन्दर को
पार पाना ,
डर से भरा मन भी जब ऊंचाइयों से दोस्ती कर लेता है
अटूट संघर्ष को जी कर फिर मिलता है जो उसे जो पाना है~मीरान्त

Sunday, March 7, 2021

कविता

हर शख़्स में 
छिपी है अनगिनत ख्वाहिशें
जिनमें छिपे है हज़ारों शख़्स
जो आज़ाद होकर 
खुले आसमान में तैरना चाहते है
लगा कर पंख ज़मीन पर उड़ना चाहते है
तालाब में खिले गुलाब की तरह धरती की 
उस मोड़ पर खिलना चाहते है
अद्भुत है जो , करना है उन्हें
न जाने कितनी उन सब असम्भव ख्वाहिशों 
को पूरा जिन्हें नही सोच सकता वो शख़्स जो
जीता है दुनियां में दुनियां के नियमों से बंधकर
दिल की बात नकार कर दिमाग को आगे रखकर
जो भागता है हवा के उन थपेड़ो से
उड़ा न ले जाये उन्हें वो उस दिशा में 
जहां उसका मन तन सब शांत हो
जो मन करे वो बात हो
सुकून से जो जी रहा हो
उम्मीदों से भरा शख़्स बंद उस शरीर का नहीं
उस तन का एहसास हो
जिसे जीना भूल गया था वो
ढूढता है जिसे
वो हर शहर ,हर गली, हर मकान उसके पास हो
मीरांत

Thursday, March 4, 2021

कविता

सुबह की अलार्म बन कर 
खुशियों की चाबी सी
हर मर्ज की दवा बनकर
सुने आंगन की हरियाली सी
रहती सबके साथ हमेशा
फिर भी अनजानी सी
वक़्त बहुत है सुनने को
लफ्जो में क्यों कमियों सी
दूसरों के दर्द में मलहम बनकर
अपने दर्द को क्यों छिपाती सी
एक मकान को जो बना देती
जगमग घर की दीवाली भी
भर्ती जो सबका सूनापन
खुद में सुनी वादी सी
लड़की से औरत और
बीवी से मां तक के सफ़र को
निखारती जो वो है प्यारी सी ~मीरांत

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...