बड़ी ही अजीब होती है ख़यालों की दुनियां
वास्तविकता से परे तो आभाषी में भी जीवंत सी
लाखों ख्वाहिशों में लिपटी सी
मन मे अलग उथलपुथल रख दे
बिना बात धकड़नों के तीव्र वेग सी
आधारों से मुक्त, स्वच्छन्द सी
भटकता मन जब भी मुक्त होकर
निकलन पड़ता है दूर इससे कहीं
उलछनों और मेहनत की इस चार दिवारी में
मानों सुंदर किसी सपनें से दूर होकर
बैठा हो कोई धधकते उस ज्वालामुखी पर
असलियत मानों जहां सामने हो और उड़ने की चाह में
आग में लिपटे उन पंखों को दर्द में भी फड़फड़ाना है
जानते हो जैसे वे पंख जितने ऊपर आसमानों को
छूने को बेचैन होंगे ,उतना आसान होगा फैले उस समुन्दर को
पार पाना ,
डर से भरा मन भी जब ऊंचाइयों से दोस्ती कर लेता है
अटूट संघर्ष को जी कर फिर मिलता है जो उसे जो पाना है~मीरान्त