आसमान में बैठा वो परेशान था
धरती पर होती इबादतों से
जहाँ दीप था होम था कपूर था लोहान था
माथा टेकने को लाखों का जमावड़ा था
बड़े बड़े भव्य स्थान था उसके लिए
नाम जिन्हें मंदिर मस्जिद दिए गए
फिर भी वो खुश नही हो रहा था
उसके फ़रिश्ते भी बैचैन थे
आख़िर हुआ क्या है?
तभी ख़ुदा के चेहरे पर गिरती
आँसू की एक बूंद ने कहा
जब उसे पूजने वाला इंसान
उसकी इबादत में डूबा इंसान
उसे याद रखता इंसान
उसके लिए लड़ता इंसान
अपने ही जैसे इंसानों को काटता इंसान
अपनों को मारता इंसान
ख़ुद में इतराता इंसान
गलती करने भी न पछताता इंसान
धर्म को बचाने की चाहत में इंसान
अंदर बसी उस ईश्वर की दी
इंसानियत को मार जाता इंसान
इंसान होकर दानव रूप में आता इंसान
इंसानियत भूल जाता है
तब ऊपर बैठा वो धर्म के पुजारियों
का देवता भी खून के आँसू बहाता है
उसने मानव को बनाया था मन से
धरती को खूबसूरत बनाने की चाहत में।
उस ख़ुदा ने अपने बंदे को जो सिखाया
आज उसको धर्म की आड़ में
झूठ की आन में ,अपने स्वार्थ के जाल में
जो कर्म उसने शुरू किये
ख़ुदा उससे बस रो पड़ा
अपनी ही मूरत को देख हार चुका
रोते बिलखते लोगों की पुकार से
इतना भर गया
अपनी ख़ुदाई पर शर्म से मर गया।~ मीरान्त