Tuesday, November 9, 2021

मुसाफ़िर

मुसाफ़िरों के शहर में 
   हमसफ़र ढूढ़ने चला था
वो मेरा ही आईना था
    जो मेरे अक्स से 
रूठ के खड़ा था
     जज़्बाती होकर
लिए थे कुछ फैसले
     बिना तालिम
दिल आगे बढ़ चला था
मीरांत
10/11/21

13 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ मार्च २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. माफ कीजिये श्वेता जी मेने अभी ये संदेश देखा ।आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

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  3. जज़्बाती होकर
    लिए थे कुछ फैसले
    बिना तालिम
    दिल आगे बढ़ चला था
    –ऐसा कैसे हुआ.. विचारणीय

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  4. सुन्दर सृजन ।

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  5. वो मेरा ही आईना था
    जो मेरे अक्स से
    रूठ के खड़ा था
    वाह!!!

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  6. बहुत खूब कहा।

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  7. आईना, अक्स से रूठकर खड़ा हुआ....
    सुंदर कल्पना, बेहतरीन अभिव्यक्ति

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