Wednesday, October 4, 2017

मासूमियत का गुनाह

यह रचना उन मासूमो को समर्पित जिनकी आत्मा को रौंद डाला गया।
           मासूमियत का गुनाह
          क्या नही था, अधिकार ,
          मुझे जीने का,
          नए सपनें सजोने का,
          गलती थी ही, क्या मेरी ?
          न था,अधिकार तुम्हें,
          मुझे सजा देने का,
          सब कुछ लूट भी लिया मेरा,
          तो ,
          जीने तो,दिया होता,
          जब डर था ,
         कर्मो के फल का,
          न ऐसा ,
         कर्म किया होता,
          मेरी मासूमियत को तबाह कर,
          किस इंसानियत का,
          परिचय दिया तुमने,
          लहू लुहान किया मुझको,
          क्या कोई अपना ,
          नही दिखा मुझमें,
          एक नन्हा मासूम ही तो था,
          अपने मां पापा की,
          आंखों का तारा ही तो था,
          क्या मिला ?
         मुझे तबाह करके,
          उनकी आंखों में ,
         जीवन भर आँसू देके,
          जिस मां ने ,
         दिया था जन्म,
          उसे भी न देखने दिया,
          ऐसा क्या,
          गुनाह किया था,
          मैंने,
          जो मुझ पर रहम भी न किया।
                          ~प्रियंका~"श्री"

7 comments:

  1. बिटिया आपने तो मेरी पुत्रवधू का कूकृत्य याद दिलाकर मेरी आत्मा का सोया दुःख जगा दिया ।। वे अगर ऐसा कूकृत्य नही करती तो आज मेरी गोद मे भी दो वर्ष का पोता खेल रहा होता

    ReplyDelete
  2. बिटिया आपने तो मेरी पुत्रवधू का कूकृत्य याद दिलाकर मेरी आत्मा का सोया दुःख जगा दिया ।। वे अगर ऐसा कूकृत्य नही करती तो आज मेरी गोद मे भी दो वर्ष का पोता खेल रहा होता

    ReplyDelete
  3. बहुत माफी चाहती हूँ कि आपका मन दुःखी हुया। और आपकी पूरी बात जानकर मुझे भी अत्यंत दुख हुया।

    ReplyDelete

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...