यह रचना उन मासूमो को समर्पित जिनकी आत्मा को रौंद डाला गया।
मासूमियत का गुनाह
क्या नही था, अधिकार ,
मुझे जीने का,
नए सपनें सजोने का,
गलती थी ही, क्या मेरी ?
न था,अधिकार तुम्हें,
मुझे सजा देने का,
सब कुछ लूट भी लिया मेरा,
तो ,
मुझे जीने का,
नए सपनें सजोने का,
गलती थी ही, क्या मेरी ?
न था,अधिकार तुम्हें,
मुझे सजा देने का,
सब कुछ लूट भी लिया मेरा,
तो ,
जीने तो,दिया होता,
जब डर था ,
जब डर था ,
कर्मो के फल का,
न ऐसा ,
न ऐसा ,
कर्म किया होता,
मेरी मासूमियत को तबाह कर,
किस इंसानियत का,
परिचय दिया तुमने,
लहू लुहान किया मुझको,
क्या कोई अपना ,
मेरी मासूमियत को तबाह कर,
किस इंसानियत का,
परिचय दिया तुमने,
लहू लुहान किया मुझको,
क्या कोई अपना ,
नही दिखा मुझमें,
एक नन्हा मासूम ही तो था,
अपने मां पापा की,
आंखों का तारा ही तो था,
क्या मिला ?
एक नन्हा मासूम ही तो था,
अपने मां पापा की,
आंखों का तारा ही तो था,
क्या मिला ?
मुझे तबाह करके,
उनकी आंखों में ,
उनकी आंखों में ,
जीवन भर आँसू देके,
जिस मां ने ,
जिस मां ने ,
दिया था जन्म,
उसे भी न देखने दिया,
ऐसा क्या,
उसे भी न देखने दिया,
ऐसा क्या,
गुनाह किया था,
मैंने,
जो मुझ पर रहम भी न किया।
~प्रियंका~"श्री"
जो मुझ पर रहम भी न किया।
~प्रियंका~"श्री"
बिटिया आपने तो मेरी पुत्रवधू का कूकृत्य याद दिलाकर मेरी आत्मा का सोया दुःख जगा दिया ।। वे अगर ऐसा कूकृत्य नही करती तो आज मेरी गोद मे भी दो वर्ष का पोता खेल रहा होता
ReplyDeleteबिटिया आपने तो मेरी पुत्रवधू का कूकृत्य याद दिलाकर मेरी आत्मा का सोया दुःख जगा दिया ।। वे अगर ऐसा कूकृत्य नही करती तो आज मेरी गोद मे भी दो वर्ष का पोता खेल रहा होता
ReplyDeleteबहुत माफी चाहती हूँ कि आपका मन दुःखी हुया। और आपकी पूरी बात जानकर मुझे भी अत्यंत दुख हुया।
ReplyDeleteVery sensitive poem
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteधन्यवाद रिंकी।
ReplyDeleteधन्यवाद नीतू जी।
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