Tuesday, October 24, 2017

विश्वास

धुंध में चलते हुए
सब अंधकारमय दिखने लगा
घबराता मन ललखड़ाते कदम
थमने को यूँ कहने लगा।

डरे हुए नयन जब
होने लगे बन्द
अहसास कुछ
यूँ मन को छू गया।

कह गया मुझसे वो यूँ
कर विदा डर
अपने मन का
खोल पट दोनों
नैनों के।

शंसा न कर
रख विश्वास दृढ़
है ईश्वरीय अंश
तुझमे भी कही।

बंद नयन यूँ खुल गए
ठहरे कदम यूँ चल गए
धुंध में भी
प्रकाश ज्योति पुंज
कुछ यूँ दिखा
मानो परमात्मा थामे हाथ मेरा
मुझे आगे बढ़ चला।।
                    ~प्रियंका"श्री"
                      25/10/17

2 comments:

  1. बहुत सुंदर कविता आपकी प्रियंका जी👌👌

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद स्वेता जी।

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