नारी सहनशीलता ,ममता की देवी
अपिरिचित अपने अस्तित्व से
जन्म से जुड़ा पिता का नाम
विवाह पश्चात जानी पति नाम से
कुछ नही उसका कुछ अपना
फिर भी सब कुछ संजोया जानकर अपना
जिन माता पिता ने पाला पोशा
उस पर भी न हक़ है उसका
हर वक़्त कहि जाती है वो
अमानत है तू किसी ओर के घर का
जिस घर व्यहि गयी बड़े चाव से
उस घर भी परायी कहलाई
जीवन पूरा दे दिया जिस घर को
अंत समय तक भी वो इज्जत न पायी
महान है ये रूप ईश्वरी
सब सहकर भी करती गयी।।
Tuesday, October 24, 2017
नारी
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कविता
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