मानसिकता
मानसी -दीदी किस चिंता में इतनी गहराई से सोच रही हो।
सब ठीक है ना ?
मानसी ने अपनी बड़ी बहन संगीता की ओर देखकर पूछा।
दीदी(संगीता)- हाँ मानसी ,घर में तो सब ठीक है।
बस मुझें यकीन नहीं हो रहा ! कि हम सच में एक आधुनिक समाज में हैं ।या सिर्फ आधुनिकता का चोला पहनें उसका दिखावा करतें रहतें है।
संगीता की इस तरह की बातें सुनकर मानसी को पूरी बात तो समझ नहीं आई ,पर ये जरूर पता लगा कि कोई तो गहरीं बात है।
जिसने दीदी की आत्मा को अंदर तक छकछोर दिया हैं।
अतः मानसी ने अपनी उत्सुकता को समाप्त करने के लिए संगीता से पूरी बात बतानें को पूछ ही लिया।
मानसी- दीदी आख़िर बात क्या है? कृपा पूरी बात बताएं।
पूरी बात जानकर जो सच सामनें आया , जिसे आसानी से भूल जाना संभव नहीं था ।
दीदी (संगीता)ने बताया कि आज से दो दिन पहले कम्मों सुबह उनके घर आकर पूरा काम बड़े खुशी से कर गयी ।
मैं (मानसी)-आपको बताना भूल गयी "कम्मो संगीता दीदी के घर उनकी घर के कामों में मदद करने आती है "
एक तरह से तो हमारी सोच के अनुरूप "वो एक काम वाली है पर मेरी दीदी को काम वाली कहना व सुनना पसंद नही ।उनका कहना है, कामवाली वो कैसे हो सकती है ,जबकि उसे हम खुद अपने घर के कामों में मदद के लिए बुलाते हैं। इसलिए मैं भी कम्मों को एक सहायक ही कहूंगी दीदी की।"
चूँकि मैं कह रही थी कि कम्मों दीदी के यहां सुबह व शाम दोनों वक्त आती है अतः जब वह शाम को दीदी के घर आई तो बड़ी ही गुस्से में थी ,उसका गुस्सा चेहरे पर साफ छलक रहा था ।उसका चेहरा देख कोई भी समझ जाता ,कि आज कुछ तो बहुत गलत हुआ है ।
यही कारण था, कि मेरी दीदी भी समझ गयी और कम्मो से पूछ डाला ,कि क्या हुआ ? सुबह तो कितना चहक रही थी। शाम तक ऐसा क्या हो गया ,कि सुबह की हंसी गुस्से में परिवर्त्तित हो गयी। संगीता दीदी की बात सुन कम्मो की आंखों में आँशु आ गए और विलख विलख कर रोने लगी ,दीदी को समझ न आया ,कि ऐसा क्या हो गया ? अतः उन्होंने कम्मो को संभालते हुए प्यार से पूछा , क्या बात है ? बता ना ।
इतना क्यों रो रही है ?
तेरे ऐसे रोने से मेरा दिल बैठा जा रहा है। तभी कम्मो ने आंखों से आँशु पोछते हुए बोला , दीदी मैं आपके यहां पूरे एक साल से हूँ। अपने मुझे कभी अपनी काम वाली नहीं समझा ,हमेशा इस घर के एक सदस्य की तरह ही मान दिया। इसलिए शायद मैं ही अपनी जगह भूल गयी , मैं भूल गयी थी, कि "मैं एक कामवाली हूँ" । जो सिर्फ यहां कुछ पैसों के लिए काम कर रही है । उसकी बात सुनकर दीदी ने उसे पूरी बात सही सही बताने को कहा , उसने बताया आपके यहाँ से काम करके ,मैं तिवारी दीदी के यहां काम के लिए गयी, वैसे तो आपके यहाँ मैं ,चाय व पानी सब पी कर जाती हूँ। तो मुझे कुछ भी मांगने की जरूरत नही होती । परन्तु आज वहाँ मुझे बहुत प्यास लगी ,
तो मैने (कम्मों)तिवारी दीदी से पीने के लिए पानी मांगा।अतः मेरे कहते ही दीदी पूरी किचन में न जाने क्या खोजने लगी ।
मैंने बड़ी हिम्मत से पूछा -दीदी मैंने तो पानी मांगा है , जिसके लिए गिलास , स्टैंड पर और पानी की बोटल गैस के पास रखी है ,तो आप क्या खोज रही हो?
तभी संगीता दीदी ने बड़े ही अचम्भित होकर पूछा?
फिर तिवारी दीदी ने क्या कहा?
कम्मो का उत्तर सुन संगीता दीदी की भी आँखों में भी गुस्सा व आश्चर्य की भावना आयी।
कम्मो ने बताया -कि उन्होंने एक प्लास्टिक का गिलास खोज कर मुझे उसमे पानी दिया।
मुझे बुरा लगा तो मैने कह दिया -कि दीदी आप इस प्लास्टिक गिलास के लिए परेशान थे ।आप बता देते तो मैं पानी कही और से पी आती।
मेरी बात सुनकर तिवारी दीदी को गुस्सा तो आया ,लेकिन अपना गुस्से को न दिखाते हुए वे बोल पड़ी- कम्मो बुरा न मानना ,क्या स्टील के गिलास में तुझे पानी देती ?
उसमे घर परिवार के लोग पानी पीते है उसमें तुम पानी नही पी सकती ।
देखों न ,तुम लोगो की न जात का पता ,न कुछ पता ।न जाने किस किस के घर क्या क्या काम करती हो ।और इससे पहले न जाने क्या क्या काम किये होंगे ?
इसलिए तुम्हे स्टील के ग्लास में पानी देकर मैं अपना ग्लास सेट खराब थोड़ी न करूँगी।
कम्मों ने संगीता दीदी से कहा - कि दीदी आज तिवारी दीदी की बात सुनकर मुझे मेरी औकात समझ आ गयी।कि इंसान की पहचान आज के युग मे उसके कर्मो से होती है ।मेरा काम छोटा है इसलिए मेरी पहचान छोटी है,इसके बाबजूद जो लोग छोटी जात के होकर बड़े कर्म करते है उनके साथ तो सभी उठते बैठते हैं।
अतएव इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद भी देती हूँ ।
और अपने मन में वचन लेती हूँ कि जो मेरे काम के कारण मुझसे यूँ व्यवहार करेगा मुझे इंसान नहीं समझेगा उसके यहाँ मैं भी सिर्फ कामवाली की ही तरह अब रहूंगी आखिर ऐसे घर में मैं क्यों अपना पन दिखाओ?
बताओ दीदी क्या मैं गलत कह रही हूँ?
कम्मो की पूरी बात सुनकर संगीता दीदी ने कम्मो को तो यह कह कर समझा दिया कि, हर व्यक्ति की अपनी अपनी सोच होती है "जिसे मैं सही समझू "जरूरी नही वाकी लोग भी उसे सही माने। तो अपना दिल छोटा मत कर और जो भी खाना पीना हो मेरे घर कर लिया कर।
और उसे शान्त कराया। वो तो संभल गयी पर दीदी के हृदय में लाखों सवाल छोड़ गई।
क्योंकि जिस तिवारी दीदी स्वयं ही एक शिक्षिका है और न जाने कितनी जाती और धर्म के बच्चों को ज्ञान देती है ।पर उनकी खुदकी सोच इतनी कुंठित होगी ये सोच ,दीदी की चिंता का कारण थी। कि जब शिक्षक ही ऐसी सोच के वशीभूत होंगे तो हमारा समाज किस ओर जाएगा।
अतः दीदी की बात ,कि हम सब आधुनिकता में तो जीवन जी रहे हैं।और शिक्षित भी हो रहें हैं।
पर हम नहीं बदल रहें तो अपनी मानसिकता ,जिससे न सिर्फ हम खुद को व समाज की सोच को भी कुंठित कर रहे हैं। और आने वाली पीढ़ी को भी यही मार्गदर्शन दे रहे हैं।यह सच्चाई है यह हमारी सोच का बहुत बड़ा विषय है ।
~प्रियंका"श्री"
1/11/2017
No comments:
Post a Comment