Thursday, November 16, 2017

अधूरापन


छूटे कदमों को
साथ मिलाकर,
अकेले पड़े हाथों
में हाथ डालकर,
अपनी ही दुनिया में
ले जाकर,
मुझसे यही गुन गुनाते हो।

हर दुख मेरा लेकर
बचे हर सुख मुझे देकर
मानो कह जाते हो।

जहाँ हूँ मैं
खुश नही,
जहाँ हो तुम
वो दुखों से भरा
सही ।

साथ होकर भी
हम साथ नहीं,
पूर्ण होकर भी
पूर्णता का आभास नहीं।

ये कैसा चक्र है
जीवन मरण का,
जो तू मेरे
और मैं तेरे पास नहीं।

क्यों तुझ संग
जीने का अधिकार छीन,
ख़ुदा को भी
कुछ अहसास नहीं।

माफ करना मुझे
जो
छोड़ अधूरा तुम्हे,
इस नाट्य मंच पर।

मैं इस संसार से
विदा हो चला,
पर इसमे,
मेरा स्वार्थ नहीं।।
                     ~प्रियंका"श्री"
                        16/11/17

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