छूटे कदमों को
साथ मिलाकर,
अकेले पड़े हाथों
में हाथ डालकर,
अपनी ही दुनिया में
ले जाकर,
मुझसे यही गुन गुनाते हो।
हर दुख मेरा लेकर
बचे हर सुख मुझे देकर
मानो कह जाते हो।
जहाँ हूँ मैं
खुश नही,
जहाँ हो तुम
वो दुखों से भरा
सही ।
साथ होकर भी
हम साथ नहीं,
पूर्ण होकर भी
पूर्णता का आभास नहीं।
ये कैसा चक्र है
जीवन मरण का,
जो तू मेरे
और मैं तेरे पास नहीं।
क्यों तुझ संग
जीने का अधिकार छीन,
ख़ुदा को भी
कुछ अहसास नहीं।
माफ करना मुझे
जो
छोड़ अधूरा तुम्हे,
इस नाट्य मंच पर।
मैं इस संसार से
विदा हो चला,
पर इसमे,
मेरा स्वार्थ नहीं।।
~प्रियंका"श्री"
16/11/17
हृदयस्पर्शी} पंक्तियाँ}...
ReplyDeleteThank u
ReplyDeleteAwesome... Painful lines...
ReplyDeleteAwesome... Painful lines...
ReplyDeleteThnk u nidhi
ReplyDeleteThnk u nidhi
ReplyDeleteTouching lines speaking pain of separation.
ReplyDeleteधन्यवाद रंगराज जी
Deleteधन्यवाद रंगराज जी
Deleteजीवन के तत्व का उदघाटन ! सुन्दर!
ReplyDeleteधन्यवाद विश्वा मोहन जी
DeleteThis comment has been removed by the author.
DeleteWow amazing
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