हल्की धूप सी खिल खिलाती
चिड़ियों सी चह चहाती
मेरे आँगन की तू चिड़िया
कभी इधर कभी उधर
फुद फुदाती।
मन एक जगह नही
रहता तेरा,
आसमान में उड़ने को कहता,
फूलों सी कोमल मेरी गुड़िया,
घर आँगन अपना महकाती।
मिट्टी की प्यारी सी मूरत,
सुकोमल,सुदृढ़,सुहृदय तेरा,
मन भावन मुस्कान है तेरी
सबके मन को जो है लुभांति।
चाँद की चाँदनी सी तू शीतल
सूरज सा तेज है तुझमे,
चेहरे की सुंदरता तेरे,
प्रेममय करुणा मन दर्शाती।
सागर सा मन विशाल,
निश्छल स्वच्छ और अपार,
प्यारी सी बोली है तेरी,
ठोस हर मन पिघलाती।
सपनें कम नही है तेरे,
पर्वत सा दृढ़ विश्वास तू रखके,
अपनें सपनो को
जीती जाती।
एक घर मे जन्म है लेती,
दूजे घर मे ब्याही जाती,
अपनी कर्तव्यनिष्ठा से,
तू दोनों घर रोशन कर जाती।
हे तू मेरी नन्ही गुड़िया
तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा
तू ही सती सावित्री कहलाती।
धन्य हो जाती है माँ तेरी
जब तू जसके जीवन मे आती।
~प्रियंका"श्री"
25/1/18
बहुत सुन्दर कविता है
ReplyDeleteDhanyavad rinki ji
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