Sunday, November 19, 2017

तू मेरी नन्ही सी गुड़िया

हल्की धूप सी खिल खिलाती
चिड़ियों सी चह चहाती
मेरे आँगन की तू चिड़िया
कभी इधर कभी उधर
फुद फुदाती।

मन एक जगह नही
रहता तेरा,
आसमान में उड़ने को कहता,
फूलों सी कोमल मेरी गुड़िया,
घर आँगन अपना महकाती।

मिट्टी की प्यारी सी मूरत,
सुकोमल,सुदृढ़,सुहृदय तेरा,
मन भावन मुस्कान है तेरी
सबके मन को जो है लुभांति।

चाँद की चाँदनी सी तू शीतल
सूरज सा तेज है तुझमे,
चेहरे की सुंदरता तेरे,
प्रेममय करुणा मन दर्शाती।

सागर सा मन विशाल,
निश्छल स्वच्छ और अपार,
प्यारी सी बोली है तेरी,
ठोस हर मन पिघलाती।

सपनें कम नही है तेरे,
पर्वत सा दृढ़ विश्वास तू रखके,
अपनें सपनो को
जीती जाती।

एक घर मे जन्म है लेती,
दूजे घर मे ब्याही जाती,
अपनी कर्तव्यनिष्ठा से,
तू दोनों घर रोशन कर जाती।

हे तू मेरी नन्ही गुड़िया
तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा
तू ही सती सावित्री कहलाती।

धन्य हो जाती है माँ तेरी
जब तू जसके जीवन मे आती।
                    ~प्रियंका"श्री"
                      25/1/18

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