कैसी ये उदासी छाई है
कैसी ये मायूसी आई है
अपनों के बीच हूँ फिर भी
मन में क्यूँ तन्हाई है।
तन्हाई,ये वो तन्हाई नहीं
ये सोच का आभास है
जो दिमाग से लेकर जन्म
दिल में आबाद है।
इस आबादी का आलम
कुछ यूँ छाया है
न घर मे है सुक़ून
न बाहर चैन पाया है।
चैनों सुक़ून पाने को
हम कुछ यूँ भटके है
लोगों के बीच जो न मिला हमें
उसे कब्रिस्तान में हमनें पाया है।
~प्रियंका"श्री"
20/2/18
positivity missing ...
ReplyDeleteवो तो होगी दिल मे दर्द ये तन्हाई जो छाई थी
Deleteजिसको चाहते दिल से उससे ना
ReplyDeleteमिलना ही तन्हाई होता है
शरीर अपनो के बीच होता है
मन उसी तन्हाई मे होता है
आभार
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद लोकेश जी
ReplyDeleteनिराशा मेपलायन या फिर आध्यात्म की राह।
ReplyDeleteसार्थक भाव रचनार।
ससुंद ।
बहुत बहुत आभार दी
DeleteBhut achhe..
ReplyDeleteसाधुवाद
ReplyDeleteसलाम पहुंचे