आज बैचैन थी कलम मेरी
चैन-ओ-सुक़ून ढूंढ़ रही थी।
चैन-ओ-सुक़ून ढूंढ़ रही थी।
पा लिया था उसने ,चैन-ओ-सुक़ून
जब जाकर वो ,कागज के पन्नों से
मिली थी।
जब जाकर वो ,कागज के पन्नों से
मिली थी।
स्याही सा खून जब
पन्नों के दिलों में जा उतरा था।
पन्नों के दिलों में जा उतरा था।
दूर हो गए थे वो सारे गिले शिकवे
जब कागज कलम से जा मिला था।
जब कागज कलम से जा मिला था।
मिलकर उनके तब जन्म
एक ऐसी नज़्म का हुया था।
एक ऐसी नज़्म का हुया था।
जिसने कागज क़लम को पूर्ण,
और ख़ुद को आबाद किया था।
और ख़ुद को आबाद किया था।
आबाद भी खुद को उसने कुछ
इस कदर किया था।
इस कदर किया था।
कि जब जब चढ़ी वह लोगों की ज़ुबान पर
वाह वाह से उसे नवाजा गया था।
प्रियंका"श्री"
27/2/18
वाह वाह से उसे नवाजा गया था।
प्रियंका"श्री"
27/2/18
बहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteआभार अंचल जी
ReplyDeleteBehtreen rachna..😊
ReplyDeleteDo visit my blog https://smartshivani.blogspot.com
Behtreen rachna..😊
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Bahut bahut abhar shivani ji .Ji bilkul apka blog dekhungi bhi aur Sarah unhi bhi
Deleteनज़्म की कहानी .... काग़ज़ क़लम से सुनानी ...
ReplyDeleteअच्छी लगी आपकी नज़्म ...
Bahut bahut aabhar digamber ji
Deleteबिल्कुल आपकी रचना 'वाह' लायक है। कागज और कलम का रिश्ता बेहतरीन ढंग से पेश किया आपने....ना मिलने से जो बेचैनी होती है
ReplyDeleteBahut bahut aabhar prakash ji
Deleteवाह क्या कहने आज लेखनी को उसका प्यारा कागज मिल गया।
ReplyDeleteअप्रतिम रचना।
Bahut bahut aabhar di...
Deleteबहुत उम्दा नज्म लिखी है.
ReplyDeleteBahut bahut aabhar saurabh ji
ReplyDeleteBahut bahut aabhar saurabh ji
ReplyDeleteकागज और लेखनी का रिश्ता शाश्वत है | बहुत अच्छा लिखा आपने प्रियंका जी | सस्नेह --
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