Wednesday, April 11, 2018

बैचैन कलम

आज बैचैन थी कलम मेरी
चैन-ओ-सुक़ून ढूंढ़ रही थी।
पा लिया था उसने ,चैन-ओ-सुक़ून
जब जाकर वो ,कागज के पन्नों से
मिली थी।
स्याही सा खून जब
पन्नों के दिलों में जा उतरा था।
दूर हो गए थे वो सारे गिले शिकवे
जब कागज कलम से जा मिला था।
मिलकर उनके तब जन्म
एक ऐसी नज़्म का हुया था।
जिसने कागज क़लम को पूर्ण,
और ख़ुद को आबाद किया था।
आबाद भी खुद को उसने कुछ
इस कदर किया था।
कि जब जब चढ़ी वह लोगों की ज़ुबान पर
वाह वाह से उसे नवाजा गया था।
               प्रियंका"श्री"
              27/2/18

15 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना

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  2. Behtreen rachna..😊
    Do visit my blog https://smartshivani.blogspot.com

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  3. Behtreen rachna..😊
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    1. Bahut bahut abhar shivani ji .Ji bilkul apka blog dekhungi bhi aur Sarah unhi bhi

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  4. नज़्म की कहानी .... काग़ज़ क़लम से सुनानी ...
    अच्छी लगी आपकी नज़्म ...

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  5. बिल्कुल आपकी रचना 'वाह' लायक है। कागज और कलम का रिश्ता बेहतरीन ढंग से पेश किया आपने....ना मिलने से जो बेचैनी होती है

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  6. वाह क्या कहने आज लेखनी को उसका प्यारा कागज मिल गया।
    अप्रतिम रचना।

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  7. बहुत उम्दा नज्म लिखी है.

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  8. कागज और लेखनी का रिश्ता शाश्वत है | बहुत अच्छा लिखा आपने प्रियंका जी | सस्नेह --

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