गैरों की बस्ती में
हमने भी अपना मकान खरीदा।
इस ख़्वाहिश में,
कि गैरों को हम अपना बना ही लेंगे।
देखो आज,
मकान भी टूट गया,
बस्ती भी छूट गयी।
गैर-गैर ही रहे,
बस हम समझदार हो गए।
प्रियंका"श्री"
27/3/18
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मकान भी टूट गया,
ReplyDeleteबस्ती भी छूट गयी।
गैर-गैर ही रहे,
बस हम समझदार हो गए।
"क्या बात क्या बात बहुत अच्छी लाइन्स है"
धन्यवाद प्रिय
ReplyDeleteवाह क्या बात है, सुंदर अप्रतिम।
ReplyDeleteसमझोता तो चाहा हमने पर
सामने वालों को फुर्सत तक न थी
कब तक आसियाना बसाये रखते
अपनी हस्ती उठाई और चल पडे ।
वाह बहुत खूब दी।आभार दी
Deleteवाह
ReplyDeleteआभार दी
Deleteआभार अमित जी
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteAabhar deepalee ji
Deleteबहुत सटीक...
ReplyDeleteबेहतरीन !!!!!!!!
ReplyDelete👏👏बहुत बढिया
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