क्या तरीका सोचा है लड़कियों से छुटकारे का।
पहले गर्भ में मार देते थे,पर उस वक़्त मेरे अजन्मे शरीर के टुकड़े ,अपने ही करते थे या करवाते थे ।
तब भी मैं तड़पती थी।
बस उस वक़्त मेरी पीड़ा,मेरा छिन्न भिन्न शरीर किसी को दिखता नही था।
अब जब बाहर आ भी जाती हूँ तो
मेरे जिस्म को नोच नोच कर, मेरे सपनो को
मेरी चीखों के साथ खत्म अब भी तो वो कर देते है जिन्हें मैं या तो जानती नही या जो मुझे अपना मानते नही।
बस अब मेरा घायल जिस्म सबके सामने रहता है मेरी जरूरत हैवानियत के लिए ही क्यों है इस धरती पर ? क्या मुझे इंसान नही माना जा सकता?😢😢😢😢😢😢
एक लड़की
ओह वेदना जो स्वर बन कागज पर बिखर गई पर पीर कौन समझे
ReplyDelete। बहुत मर्मांतक रचना ।
प्रिय प्रियंका -- एक लड़की के मन की अनकही पीड़ा को श्बोब में पिरोती रचना एक लडकी के मन का शोक गीत है | ये वेदना जब दूसरी नारी समझती है तो अनमोल हो जाती है | सचमुच एक लडकी को इंसान समझने में ना जाने कितने दिन लग जायेंगे | सस्नेह -- |
ReplyDeleteसही कहा आपने ।पर ये बात हम ही समझ सकते है
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