Wednesday, April 18, 2018

कह दो

मैं भी हूँ,
तुम भी हो,
और वो अधूरी बात भी है।
मैं भी यहाँ,
तुम भी यहाँ,
और ये चाँदनी रात भी है।
रात के अंधेरे में
चाँद की पहरेदारी में
उन असँख्य सितारों
की टिमटिमाती रोशनी में
कह दो।
कह दो,
जो भी हो दिल मे,
उसे मत रोको,
जो छुपा रहे हो बरसों से,
उसे आज जुबान पर रखकर,
दिल की धड़कनों को बढ़ाकर,
कह दो मुझे।
क्या पता?,
क्या पता ?,
कल ये रात हो न हो,
तुम्हारी मेरी बात हो न हो,
आज ये साथ है,
कल ये साथ हो न हो।
फिर ये अधूरी बातें,
महज़ अधूरी याद बन जायेंगी,
जो तुम्हारी रूह में ही,
सिमट कर रह जाएंगी।
फिर तलाशोगे भी तुम,
वक़्त वो पहला,
जो मिल न पायेगा तुम्हें,
तो ये अधूरी बात,
सदा के लिए ही,
एक अधुरा ख्वाब बन जाएगी।
गर पहुँचा न सके मुझ तक ,
ये अधूरा ख़्वाब तुम,
तो ये ख़्वाब हमारी जिंदगी की कयामत की ,
आखिरी रात बन जाएगी।
                               प्रियंका "श्री"
                               17/4/18

11 comments:

  1. Bahut accha likha aapne....behad shandar

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद नीतू जी

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  2. सुंदर श्रृंगार काव्य उच्चतम काव्यात्मक सृजन

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  3. प्रिय प्रियंका जी -- अनुरागी मन की अनुपम मनुहार | सच है समय निकलने से पहले मन की बात कह देने में ही जीवन की सार्थकता है | श्रृंगार रस की सुंदर रचना | सस्नेह

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