Monday, April 16, 2018

ख़्याल

गैरों की बस्ती में
हमने भी अपना मकान खरीदा।
इस ख़्वाहिश में,
कि गैरों को हम अपना बना ही लेंगे।
देखो आज,
मकान भी टूट गया,
बस्ती भी छूट गयी।
गैर-गैर ही रहे,
बस हम समझदार हो गए।
                       प्रियंका"श्री"
                       27/3/18

12 comments:

  1. मकान भी टूट गया,
    बस्ती भी छूट गयी।
    गैर-गैर ही रहे,
    बस हम समझदार हो गए।

    "क्या बात क्या बात बहुत अच्छी लाइन्स है"

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  2. वाह क्या बात है, सुंदर अप्रतिम।
    समझोता तो चाहा हमने पर
    सामने वालों को फुर्सत तक न थी
    कब तक आसियाना बसाये रखते
    अपनी हस्ती उठाई और चल पडे ।

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    Replies
    1. वाह बहुत खूब दी।आभार दी

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