अक्सर,
लिखकर छोड़ देती हूँ
नाम उसका
कागज के एक टुकड़े पे
इस ख्याल से
कि
शायद वो मेरी खामोशियों को पढ़ ले.....
प्रियंका श्री
19/5/18
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कविता
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वाहः
ReplyDeleteबेहतरीन
ख़ामोशियों की ज़ुबान बस प्रेम पढ़ सकता है ...
ReplyDeleteअच्छा ख़याल ...
सुन्दर प्रस्तुति !
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !
मोहब्बत तो मरता नही काश तेरे एहसास में मै जिंदा होता...
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