यही सिलसिला है मेरी कहानी का
उसकी चौखट मेरा अफसाना
दूर तलक हर शाम को डूबते सूरज के साथ
सोचा था बैठेगे कभी झील के किनारे
नारंगी रंग में धुले बादलों के साथ
तुम गैर हुए कोई बात नहीं
दूर हो मुझसे मेरे पास नहीं
फिर भी एक आहट है दिलमे
तेरे मेरे होने के पास
कोशिश है करना ही होगा
दर्द के टुकड़ों को सीनाही होगा
मुस्कुरा कर जिंदगी को मेरी
बिन तेरे अब जीना ही होगा~priyaankakhare
मुस्कुराना इसलिए क्योंकि दिल की गहराई में सभी के एक प्यारी सी मुस्कान छिपी है
ReplyDeleteजी बिल्कुल अनिता जी
Deleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
Deleteबहुत बहुत शुक्रिया दीदी
ReplyDeleteसोचों की तकली से,
ReplyDeleteआहों के कपास थामे,
काते हैं हमने,
आँसूओं के धागे ..
टुकड़ों को दर्द के,
सीने के वास्ते .. बस यूँ ही ...
बहुत खूब।
ReplyDeleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteShukriya sir
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