मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।
जग जग घूमूँ , डग डग चूमूँ
फिरता फिरू,बन एक फकीरा।
मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।
सखा हुया सूरज अब दखो
दिखलाये हर डग पे सबेरा।
फैली हुई उसकी किरणें
अंतर्मन में भरे उजेला।
मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई बसेरा।
दिव्यप्रभा ज्वलित कर जाता
वो भोर का ,है प्रथम सितारा।
राही का पथ दर्शक बन जो
मार्ग उचित दर्शित करजाता।
निभाने अपनी विहित रीत जो
सदैव उदित पूरब से अम्बर पर आता।
मैं रक राही हूँ, इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा।
चाँद की जब चंचल किरणों से
शीतल होता तन मन मेरा।
फैली हुई तारों की रजनी
पेहरी बन कर देती पेहरा।
मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।
एकाकीपन से खाली मन जब
विरक्ति के भावों से भर जाता।
धरती का तब प्रत्येक कण
मां बन कर जो, प्रेम आशीष लुटाता।
फैला गगन तब आँचल बनकर
मुझको अपने चित्त लगाता।
मैं एक राही हूँ ,इस जग का
न कोई ठौर,न कोई बसेरा।
अपनत्व भाव से ऊपर उठता
अपना पराया सब विसराता।
हर जन को स्वीय मानकर
आपस मे प्रेम बंटन कर जाता।
सम्पूर्ण जग को निज मानकर
फिरता फिरू बनकर मैं,यूँ ही अकेला।
मैं एक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर , न कोई बसेरा
हर बन्धन से होकर मुक्त मैं
उड़ता फिरू खग सा स्वतन्त्र मै
अम्बर, धरा है मेरा डेरा।
मैं रक राही हूँ इस जग का
न कोई ठौर, न कोई एक बसेरा।
~प्रियंका"श्री"
12/2/18