Wednesday, March 7, 2018

विचार

भावसमुद्र के बीचों बीच
बसा था मकान मेरा,
जो ऊंची-ऊंची लहरों में,
कभी ऊंचा उठता,
कभी नीचा होता।
संभाल रखा था।मैंने उसे ,
उन भावों से भरे
सागर की लहरों से,
आखिर अंदर
जो बसा था जहान मेरा।
                      ~प्रियंका श्री
                         7/3/18

4 comments:

  1. बहुत सुंदर आदरणिया अनुजा

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  2. वाह बहुत सुंदर।
    भावना का सुंदर एहसास।

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  3. जो अंदर है बो अंदर रहे तो अच्छा है ... मन के भाव बाहर आएँ तो जग के भाव बन जाते हैं

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