भावसमुद्र के बीचों बीच
बसा था मकान मेरा,
जो ऊंची-ऊंची लहरों में,
कभी ऊंचा उठता,
कभी नीचा होता।
संभाल रखा था।मैंने उसे ,
उन भावों से भरे
सागर की लहरों से,
आखिर अंदर
जो बसा था जहान मेरा।
~प्रियंका श्री
7/3/18
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कविता
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बहुत सुंदर आदरणिया अनुजा
ReplyDeleteआभार आदरणीय
ReplyDeleteवाह बहुत सुंदर।
ReplyDeleteभावना का सुंदर एहसास।
जो अंदर है बो अंदर रहे तो अच्छा है ... मन के भाव बाहर आएँ तो जग के भाव बन जाते हैं
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