कहते है जब तराजू के दोनों पलड़े समान होते है तभी वस्तु का भार और मोल सही लगता है। यही बात हर परिस्थिति में उपयुक्त होती है फिर चाहे बात सत्ता की ही क्यों न हो?
वहां भी तराजू के दोनों पलड़े अर्थात पक्ष और विपक्ष का सही अनुपात में होना व विशेष रूप से विपक्ष का मजबूत होना एक सही लोकतंत्र की न सिर्फ मांग होती है यही उसका आधार भी है| जो सरकार की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने में मददगार सिद्ध होता है| 11 मई से 19 मई तक 17 वी लोकसभा के लिए हुए चुनाव के बाद जो परिणाम 23 मई को आये जिसके तहत एनडीए ने बहुमत के साथ जीत दर्ज की तथा काँग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।उसके बाद से काँग्रेस की जो भी हालत देखने को मिल रही है उससे लोकतंत्र का सुचारू रूप से चलना खतरे की निशानी को दर्शा रहा है | जिस प्रकार से किसी भी प्रतिस्पर्धा में हार-जीत का होना उतना ही तय होता है, जितना कि सुबह-शाम का होना । उसी प्रकार से चुनाव में भी हर जीत होती है परन्तुं महत्वपूर्ण होता है हार के बाद भी लोकतंत्र में खुद के अस्तित्व को बनाये रखना व उसके लिए सदैव कार्य करते रहना। परन्तु जिस तरह की आशंकाए,घटनाएं एक राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) में हो रही है उसको देख कर तो यही लगता है कि या तो वह अपनी हार स्वीकार ही नही कर पा रही है या अपने दायित्वों से दूर भाग रही है जहां काँग्रेस को एक मजबूत विपक्ष के रूप में सरकार की नीतियों ,कार्यशैलियों तथा कार्यप्रणालियों पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए उनका समर्थन व विरोध करना चाहिए । वह यह न करते हुए ,अपने ही पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद से गुजर रही है इस वक़्त जहां काँग्रेस ,अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी को एक महत्वपूर्ण भूमिका के साथ विपक्ष को मजबूत बनना चाहिए वे स्वयं को पार्टी से अलग कर रहे है या यूं कहूँ उन्होंने अलग कर दिया है पर क्या ये सही वक्त है इस तरह की गतिविधियों का। उनके इस्तीफे के बाद जिस तरह से कांग्रेस के कई मंत्रियों, विधायकों द्वारा इस्तीफे दिए जा रहे है और जिस तरह से कर्नाटक और गोवा में पार्टी की स्थिति बिगड़ रही है यह काँग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए । इससे तो यही लगता है कि काँग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाना नही चाहती ।वह सिर्फ स्वयं को सत्ता में पक्ष या सरकार के रूप में देखना उचित समझती है । यदि ऐसा नही तो ये इस्तीफों का दौर क्यों? 28 दिसंबर 1885 को स्थापित पार्टी का 134 साल बाद इतनी कमजोर व संकट की अवस्था मे होना अत्यंत चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है। जहाँ पार्टी को आत्ममंथन व हार के कारणों के बारे में सोचना चाहिए ,वहां इस तरह की प्रतिक्रियाएं न सिर्फ चौकाने वाली अपितु एक कमजोर पार्टी को दर्शाती है जो भारत के लोकतंत्र के लिए सही नही है । क्योंकि ऐसी स्थिति में केवल एक ही पार्टी का स्वायत्त अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो सकता है यह समय है मजबूत विपक्ष के रूप में मजबूती के साथ सत्ता के कार्यो को देखने व समझने का। अतः काँग्रेस पार्टी को अब राहुल गांधी को मनाने में समय व्यर्थ न करते हुए ,अपना न सिर्फ अध्यक्ष चुनना चाहिए बल्कि आने वाले अन्य विधानसभ चुनाव जैसे महाराष्ट्र, पंजाब,हरियाणा, दिल्ली,उत्तरप्रदेश आदि को जीतने की रणनीतियों पर भी अब ध्यान देना जरूरी है । क्योंकि अब वक्त स्वयं को पुनः स्थापित करने का है न कि हर दायित्व से दूर भागने का। आशा है काँग्रेस जल्द ही अपना अध्यक्ष चुनकर पार्टी के कार्यों को सुचारु रूप से शुरू कर देगी तथा पार्टी के अंदर चल रहे द्वंद भी समाप्त हो जायेंगे।
लेखिका
प्रियंका खरे"श्री"
12/7/2019
Tuesday, July 23, 2019
मजबूत लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी
Sunday, July 14, 2019
वो कौन थी
वो कौन थी
आज वो कौन है
सिकन है ये कैसी
माथे पे उसके,
अनजान हो गये
चेहरे की, वो खुशी ,
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लिपटी है खुदमे
या खुल सी गयी है
मासूम सी मायूस सी
कली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
लफ्जों में बंधी है
पढ़ी गयी है अर्थों में
अनसुलझी सी
एक अनजान पहेली
वो कौन थी
आज वो कौन है।
ख़्वाओं में देखा था जिसे
ख्वाहिस थी जिसकी
अधूरे ख्वाब से रह गयी
वो कौन थी
आज वो कौन है
आँसुयों की सच्चाई है
या बंद लबों के शब्द
जानता था मैं जिसे
वो कौन थी
आज वो कौन है
लड़कपन सा था जिसमे
सयानी फिर भी दिखती थी
रहती थी जो अपने धुन में
वो कौन थी
आज वो कौन है
समझा जिसे न तब कोई था
न अब कोई समझ सका
मीलो चलते रास्ते सी
अजनबी,
वो कौन थी
आज वो कौन है
प्रियंका श्री
14/7/19
Monday, July 1, 2019
सत्ता में महिलाएं भी सुरक्षित नही
बात जब महिलायों की आती है तो उन महिलायों पर अकसर चर्चा होती है जो कमजोर है खुद के निर्णय नही ले सकती ,ज्यादा पढ़ी लिखी नही है, स्वतंत्र नही है न ही सोच से और न ही सामाजिक बंधनो से, जो हमेशा पुरुष प्रधान देश में सिर्फ एक ऐसा पुतला बनकर रहती है जो पुरुष के कहे अनुसार ही चलती है। ऐसा वर्ग औरतों का दयनीय ,कमजोर वर्ग कहलाता है वही दूसरी तरफ पढ़ी लिखी, आपमे निर्णय लेने वाली, आत्मविश्वास से भरी, खुद के पैरों पर खड़ी महिलायों का वर्ग है। जिसे मॉर्डन भी कहा जाता है पर अगर दोनों की स्थिति को नापा जाए तो ज्यादा अंतर नही मिलने वाला । और जो अंतर है भी वो ये है कि पढ़ी लिखी महिला जागरूक होती है इसलिए गलत पर आवाज़ उठती है जिसकी वजह से उसे हर बार न जाने कितनी गलियों से , निगाहों से, शब्दों से अपमानित भी होना पड़ता है। बस वह दबती नही तो उसकी चर्चा हो जाती है सब तक एक खबर की तरह पहुच जाती है ऐसा ही अब देखने को मिलता है राजनीति के क्षेत्र में ,पहले भी जहाँ महिलाएं रही है और बड़े बड़े औदों पर फिर भी कभी उनके चरित्र व उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग नही किया गया परन्तु आज कल के नेतायों को न जाने क्यों लगता है कि
महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी करके वे उन्हें कमजोर और असहाय महसूस करा सकते है व उन्हें उनके कर्म से दूर करा सकते है?
एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेताओं द्वारा एक प्रसिद्व अभिनेत्री व सांसद रही महिला पर की गई टिप्पणी इतनी शर्मनाक थी कि टीवी चैनेल भी उसे mute करके दिखा रहे है क्या यही आज की राजनीति है जो सिर्फ अब अभद्र भाषा ,चरित्र पर धावा बोलकर खुद को निश्छल और साफ बनाना बताती है अगर आपके पास उनके द्वारा किये गए जन कार्यों पर कोई प्रश्न नही है तो ऐसी भाषायों का उपयोग आपके चरित्र व सम्मान को शोभनीय नही लगता ।आप जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि है जब आप ही शालीन और शोभनीय भाषा का उपयोग नही करेंगे तो आम जनता से क्या आशा करते है।
कहते है न जैसा राजा वैसी प्रजा....
अतः महिलाओं से विनती है कि अब उन्हें खुद के लिए कदम उठाने ही होंगे व ऐसी टिप्पणियों के जबाब भी देने होंगे।महिलाएं कही सुरक्षित नही है और यही आज की सच्चाई है ।
प्रियंका श्री
1/7/19
Thursday, June 27, 2019
असुरक्षा का कारण डर का अभाव
21 वी सदी में होने बाबजूद भी आज की महिला जो खुद के पैरों पर खड़ी है ,आत्मनिर्भर है, अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, जागरूक है, पर ये सब सिर्फ कहने की बातें है जो लिखने में और बोलने में बहुत अच्छी लगती है। पर उसका असल मतलब उस औरत से पूछो जिसमें ये सारी क्षमताएं होने के बावजूद ,उसे घर और कार्यस्थल पर हीन भावना ,मानसिक या शारीरिक हराश्मेन्ट का शिकार होना पड़ता है फिर भी वह लड़ती है खुद के बजूद के लिए, अपनो के लिए ।
फिर भी इस लड़ाई या युद्ध को कई बार प्रत्यक्ष रूप से सामने नही ला पाती । क्योंकि जानती है कि समाज के लोगों के द्वारा उसके ही चरित्र का निर्धारण कर दिया जाएगा या कह दिया जाएगा आदमी जात तो ऐसी ही होती है तुम ध्यान मत दो या इतनी परेशानी है तो काम ,स्कूल,या वो जगह ही छोड़ दो ।
पर मेरा सवाल है ...क्यों ?
क्यों एक स्त्री को ही हर तरफ से बोला जाता है क्यों नही उस दूसरी ओर खड़े इंसान को कटघरे में उतारा जाता है जो उसकी इस स्थिति के लिए कुसूरवार है । मेरा सिर्फ एक ही प्रश्न है-
क्यों है समाज ऐसा?
इसलिए उसे परोक्ष रूप से अपनी लड़ाई लड़नी होती है और इस लड़ाई में यदि उसका परिवार साथ है तो आधी जंग वो जीत जाती है। रही कसर उस तरह के इंसान से लड़ने की तो ,वो मिले घर परिवार के मनोबल से उस जंग में भी फतेह हासिल कर ही लेती है। पर उनका क्या जो अकेली टूटती रहती है जो अपने परिवार को भी नही कह सकती है समाज तो दूर की बात है उनका या तो सर्वस्व खत्म हो जाता है या वो खुद। कितनी अजीब बिडम्बना है न जिस समाज मे हम औरत को देवी के रूप में पूजते है उसको शक्ति का अवतार मानते है सजीव जगत में उसी का हनन करते है क्योंकि इंसान दो मुखोटे में पैदा होता है। जब वह नन्हा बालक होता है तो हर स्त्री को मां बहन दोस्त के रूप में देखता है और दूसरा रूप समाज से परिचित होने के बाद वही मां ,बहन ,और दोस्त रूपी स्त्री उसकी हवस रूपी भूख मिटाने का माध्यम बन जाती है और वो सम्मान ,अपनापन सब नष्ट हो जाता है ।
पर ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि स्त्री चुप रहती है उसे कमजोर समझ कर उसका हनन आसान समझ लिया जाता है पर अब नही अबकी न स्त्री कमजोर है न वासना की वस्तु उसका स्वयं का अस्तित्व है जिसको अब बनाये रखने का जिम्मा उसने खुद उठाया है बस अब समझने की बारी उस समाज के लोगो की है जो स्त्री की न में हाँ समझ लेते है जबकि उसकी न का मतलब ही न होता है
मतलब न न और न।
पर अब तो समाज मे एक नई तरह की किस्म का जन्म हुआ है जिसकी मानसिकता को समझ पाना बहुत मुश्किल है एक ऐसे जानवर का जन्म हुआ है जिसने मासूमियत को भी मार दिया है स्त्री के उस रूप पर वार किया है जिन्हें अबोध बोला जाता है जिन्हें हर रूप में सिर्फ एक अच्छा इंसान ही नज़र आता है ।
जी हाँ समाज का वो रूप जो एक महीने ,6 महीने, 10 ,12 साल के बच्चों को अब चुनते है ये शर्मशार है चाहे कठुआ कांड हो,भोपाल कांड हो ,दिल्ली कांड हो या कोई अन्य राज्य या देश में हो रही हैवानियत हो । इन मासूम बच्चों की मासूमियत को कैसे नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है ,कैसे उनको रोता हुए वो देख पाता है ,क्या उनकी चीखे अपनी माँ या पिता को पुकारती आवाज़ उसकी आत्मा को नही सुनाई देती, क्या उसमे उसे अपने परिवार का मासूम कोई बचपन नही दिखता ,क्या उसे मासूम का दर्द नज़र नही आता। कोई इतना क्रूर कैसे हो जाता है ? और अगर ये सब उसके मजे की वस्तु है तो अब इस समाज को ही अपने आस पास जन्म ले रहे ऐसे जानवरो को पहचानना होगा और उनका सर्वनाश करना होगा। अब कानून को तीव्र होना होगा , फास्टट्रैक कोर्ट जैसी व्यवस्था ऐसे केसों में हमेशा होनी चाहिए ।मेरे विचार में तो ऐसी मानसिकता रखने वालों को तो कानून के द्वारा ऐसी सजा देनी चाहिए ताकि दूसरा करने से पहले सोचे और सोचकर भी ऐसी शर्मशार हरकत न कर सके ।क्योंकि ये खोखली मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी मासूमियत को मारती जाएगी। और भारत का भविष्य डर की अंधेरी गलियों में गुम हो जाएगा उसका विश्वास इंसान इंसानियत सब से उठ जाएगा जिसको सोचना भी एक भयाभय स्थिति को बताता है असलियत को बयाँ करना मुश्किल है । अतः सरकार द्वारा ऐसे इंसानों में कानून का डर ही अब स्थिति में सुधार लाएगा।
प्रियंका"श्री"
27/6/19
Thursday, May 23, 2019
अपेक्षाएं
धरती पर जन्म लेते ही जैसे मानव में बुद्धि और समझ का विकास होता है उसमें अपेक्षायों की बृद्धि होने लगती है ।और यही से शुरू हो जाता है मानव जीवन मे दुखी होने का रास्ता।
जब तक मानव एक अबोध बालक होता है उसके अंदर उम्मीदें न के बराबर होती है लेकिन जैसे जैसे बढ़ता है चेहरे पहचानने लगता है स्पर्श समझने लगता है उसकी जरूरतों का प्रारम्भ हो जाता है ।
और धीरे धीरे वो तेज़ दलदल में पड़ता जाता है जहां से निकलना उसके सामर्थ में नही होता। जब तक वह ये न जान ले कि ऐसा होने कारण क्या है?
क्यों जो बचपन मे सिर्फ कुछ कारणों से दुखी था उसके विकास के साथ उसके दुख भी बढ़ते गए।
दुखों के कारण कई होते है पर बहुत से कारणों का जन्म दाता है अपेक्षाएं ,उम्मीदें, जरूरते, उन पर निर्भरताएँ।
इसे समझना आसान नही ,पर नामुमकिन तो बिल्कुल नही ।
बस इतना जानना है कि जब हमारा जन्म इस धरती पर अकेले हुआ है और हमारी मुत्यु भी अकेले ही होनी है और हर व्यक्ति को ईश्वर द्वारा अपना शरीर प्राप्त है तो क्यों हम किसी से भी अपेक्षाएं करे।
हमारा संकल्प जीवन को मन के भीतर से सुखमय बनना होना चाहिए । न कि ईश्वर के दिये वरदान को दूसरों पर अपेक्षाएं रखकर दुखी करना । जो अपेक्षाएं हम दूसरों से करते है पहले स्वयं से करें। क्या वो हम पूरी कर सकते है?
अगर हां, तो पहले स्वयं प्रयत्न करें, तभी इस मूल्यवान जीवन मे खुशी का सार समझ आएगा।
प्रियंका श्री
#विचार #अपेक्षाएं #जीवन #thought #life
Saturday, May 11, 2019
मदर्स डे
मोबाइल में यूट्यूब पर रोज की तरह ही अपने लेक्चर देख- सुन रही थी तभी एक विज्ञापन आया मदर्स डे पर, विज्ञापन को देख मुझे याद आया कि अरे कल तो मदर्स डे है। पर कुछ ही देरी में खुशी से खिला चेहरा मुरझा गया ,आखिर अपने घर से दूर अपने माँ पापा से इतनी दूर भोपाल में पढ़ने जो आयी थी और मेरी परीक्षा भी 1 हफ्ते बाद ही थी तो घर भी नही जा सकती थी। तभी दिमाग मे आया कि आज के टेक्नोलॉजी के जमाने मे दूर रहकर भी मैं अपनी माँ को गिफ्ट भेज सकती हूं तो मैंने ऑनलाइन शॉपिंग की सभी साइट को देख डाला और एक अच्छी सी घड़ी पसन्द कर मां के लिए खरीद ली और घर के पते पर भेज दी।
इतना करने पर भी एक खाली पन सा था मन मे, क्योंकि घर पर मदर्स डे पर मैं सुबह होते ही मां को गिफ्ट्स देती, उनके मन का खाना बनाती और शाम को हम दोनों घूमने जाते।
पर आज मां के लिए गिफ्ट तो खरीद लिया बाकी की पूर्ति के लिए मैं उनके पास न थी। अधूरी खुशी लिए मन पढ़ने में न लगा तो किताब बन्द कर ,आँखें मूंद ली ।पता न चला कब आंख लग गयी और लगभग एक ढेर घण्टे बाद जब आँख खुली तो हॉस्टल में खाने का वक़्त हो चला था मन न होते हुए भी खाने के लिए मेस में चली गयी । वहां देखा सब लड़कियां खाना खा रही है और मदर्स डे पर बात कर रही है ,तभी हमारे मेस के भैया आये और बोले-
आप सब कितना सोचते है अपने माता पिता के बारे में ,आप लोगों ने अपनी माँ के लिए गिफ्ट भी भेज दिए और एक तरफ उन लोगो के बारे में सोचो जो अपने माता पिता को वृद्धा आश्रम में छोड़ देते है और उनकी खैर खबर भी नही लेते।
ये कहकर भैया तो चले गए पर मेरे मन मे न जाने क्यूँ ? एक बैचेनी छोड़ गए ,बैचेनी इसलिए क्योंकि मैं भी अपनी माँ से दूर थी और माँ मुझसे।
तभी जल्दी खाना खत्म कर । मैंने अपने क्लास के व्हाट्सअप ग्रुप पर मदर्स डे सेलिब्रेट करने की बात कही ,कुछ ही वक़्त में सबका पोजेटिव रिस्पांस मिलने लगा और प्रोग्राम बन गया कि कल हम सब पास के वृद्धा आश्रम जाएंगे और सबने अपनी जिम्मेदारियां बांट ली।
सुबह 10:30 बजे मिलने का बोल मैं सुबह के इन्तेजार में सो गई। सुबह के सात बजे का अलार्म बजा मैं तुरन्त उठकर जल्द से जल्द तैयार होने चली गयी।
ठीक 10:30बजे तक हम सब कॉलेज में इकट्ठे हुए।
केक,बलून्स,गिटार,खाने पीने की कई चीजें लेकर निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर।
लगभग साढे 11 बजे हम सब वृद्धा आश्रम पहुँच गए और वहां की अथॉरिटी से बात कर सब बुजुर्गों से मिलने लगे।
वहां की सभी बुजुर्ग माओं ने मिलकर केक काटा , मेरे कई क्लासमेट ने गाना गाया ,डांस किया हमारे साथ सभी लोगो ने बहुत एन्जॉय किया और इस एंजॉयमेन्ट में पता ही नही चला कि कब शाम के 6 बज गए और वक़्त जाने का आ गया।
ये मदर्स डे तो मैंने बहुत एन्जॉय करके मनाया पर जाते वक्त हम सब की आँखों मे आँसू थे आँसू इस बात के नही थे कि हम सब उनको खुशियां देकर फिर उन्हें तकलीफ देकर जा रहे थे । आँसू तो इस बात के थे कि फिर उनको इन्तेजार दे रहे हैं फिर किसी दुसरे के आकार उनके जीवन के कुछ पलों में कुछ पल की खुशियां देने का ।
वो भी ऐसी खुशियाँ जो हमेशा अधूरी रहेगी।
बहुत कीमती होता है वो आँचल
जिसकी छांव में ठंडक नसीब होती है
ऐसा नसीब भी सबका होता है कहाँ
जिनका होता है वो खूब ,
जिनका नही वो बदनसीब होते है
Happy mother's day
लेखिका
प्रियंका श्री
Wednesday, April 24, 2019
छोटी सी मुस्कान
बात बहुत छोटी पर जब-जब याद आये होठो पर मुस्कान खिल उठती है ।
हुआ यूँ बस का इन्तेजार करते हुए मैं बस स्टॉप पर खड़ी थी, तभी बस no 4 आकर खड़ी हो गयी जो लोग भी बस स्टॉप पर थे सब बस में चढ़ गए चूंकि मुझे बस no 8 से जाना था तो मैं बस स्टॉप पर ही खड़ी बस आने का इन्तेजार कर रही थी । तभी देखा, तो बस से थोड़ी दूर पर एक मोड़ से एक बुजुर्ग जो कुर्ता पजामा और पैरों में जूते पहने हुए थे ,हाथ मे नीले रंग का थैला लिए हुए, तेज तेज कदमों से चल रहे थे ,शायद उनके पैरों में तकलीफ थी इसलिए उनकी चाल में लड़खड़ापन था फिर भी चाल में तेजी थी और चेहरे पर बस न छूट जाने के चिंता के भाव । उन्हें देख मेने सोच लिया था कि अगर बस ड्राइवर ने बस शुरू की तो मैं रुकवा दूंगी पर मेरे सोचते-सोचते ही वो बस के पास पहुच गए और पहुचते ही उस सांवले, झुर्रियों वाले चेहरे पर खिली मुस्कान ने से छकाते वो टेढ़े मेढ़े दो दांत ऐसे झांकने लगे मानो सारे जहां की खुशी मिल गयी हो और उनकी वो सबसे क्यूट सी मुस्कान को देख मेरे चेहरे पर मुस्कान खिल उठी ...बहुत प्यारा एहसास था सुबह का। पूरा दिन उस मुस्कान से अब अच्छा बीतेगा। जानते है क्यों? क्योंकि एक छोटी सी खुशी जब खुद को इतना अच्छा एहसास देती है तो सोचो वो बिखरी मुस्कान न जाने कितने चेहरों को खिलाने की ताकत रखती है। यूँ ही मुस्कुराते रहिये और मुस्कान बिखराते रहिये...
कविता
जब जब सोचा आखिरी है इम्तिहान अब । मुस्कुराकर मालिक ने कहा खाली जो है बैठा दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...
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लिखने वालों की भी अजीब दुनियां होती है जहां न दुख ,न खुशी की कमी होती है। खुद से ही जुड़े होते है खुद में ही सिमटे होते है पर जब कलम च...
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मैंने रिश्तों को बदलते देखा है मजबूरी से नहीं, जरुरतों के अनुरूप ढ़लते देखा है मैंने रिश्तों को बदलते देखा है। पहले गैरों और अपनों में एक...
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जिंदगी में मुश्किलें कई हो, रास्तों पर अड़चने कई हो, डर कर रुक जाना ये तू नही है डर कर मर जाना ये तू नही है मंजिले दूर सही , चलकर आधे रास्ते ...