Sunday, December 31, 2017

कैसे जीवन को अपने लक्ष्य से पूर्ण करूँ

आज फिर मन डगमगाने लगा
अपनी राह से भटकने लगा
बार बार यही विचार लाने लगा
क्या चुना गया रास्ता मेरा
सही है?
गर है तो
मन इतने सवालों से क्यूँ बंधा।

कैसे इस
विचलित मन को शांत करूँ
इसके अंदर चलते
अनगिनत भावो को नियंत्रित करूँ
रास्तों को मंज़िलों में
कैसे तब्दील करूँ
कोई तो बतला दे मुझे
कैसे जीवन को अपने लक्ष्य से पूर्ण करूँ।
                                ~प्रियंका"श्री"
                                   31/12/17

Thursday, December 21, 2017

मन

क्षिप्र मन करे विचरण
लेकर अनगिनत भावो को संग।

कभी शांत चित्त,
कभी अशांत मन।

जहां जैसा दृश्य देखे नयन,
वैसा भाव राखे मन,
भावों के सागर में डूबा,
विह्लल मन,गलियों गलियों फिरे।

क्या करूँ कहाँ जाओ,
यही प्रश्न धर कर,
अवसन्न चित्त से,
बारम्बार विचार करें।

भावो के सागर में,
भावमग्न होकर ,
जब मन ,न कर पाए
वश में भावों रूपी लहर,
अतृप्त मन भटकाव करे।

सोच विचार कर ,
शांत मन को करने के,
कैसे कैसे अथक प्रयास करे।

तृप्ति पाने को मन ,
न जाने क्या क्या प्रपंच रचे।

कई बार सफल ,
कई बार विफल हो कर,
समझ असमझ के खेल में,
मन से हारा सब जग ,
तब धर हावी मन,
दर्शाये मार्ग पर चले।

चंचल मन चन्द्र सम
प्रकाशमय कर पूरा तन
न जाने कितने रंगों से रंगे।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           21/12/17
                          

Tuesday, December 12, 2017

कहानी और उसके किरदार


                कहानी और उसके किरदार
कहानी की तलाश में,
भटकते हुये,
जब रास्तों,
चौराहों से गुजरते हैं।

हर एक मोड़ पर,
अपरिचित कितनी कहानियाँ,
महसूस कर जाते हैं।

न जाने,
कितनें किरदार,
नजरों में समा जाते हैं।

उस,
हर एक किरदार में,
छुपी होती हैं।

अनभिज्ञ असंख्य कहानियाँ,
कुछ जानी-बुझी सी,
कुछ अनजानी सी
प्रतीति।

कुछ चित्त छू जाती हैं,
कुछ हँसा जाती,
कुछ आँखों में,
करुणा जगा जाती हैं।

कुछ वीरता से परिपूर्ण,
कुछ वात्सल्य,
कुछ भक्ति भाव से पूर्ण,
तो,
कुछ रोष उत्पन्न,
कर जाती हैं,
कुछ अल्हड़ सी,
प्रतीत हो जाती हैं।

जब किरदारों को,
शब्दों में पिरोके,
उसमें भावों का,
पिटारा घोल के,
प्रस्तुत करते हैं।

तब कहानीकार की
कहानी पूरी होती हैं।

जो मुझसे,
तुमसे,
हम सब से,
जुड़ी हुई होती हैं।

लिखी गयी,
हर कहानी,
एक आम आदमी से शुरू,
एक आम आदमी,
पर खत्म होती हैं।
                    ~प्रियंका"श्री"
                       12/12/2017

Friday, December 8, 2017

ज्ञान


                          ज्ञान

ज्ञान पहला लीजिये, मां की सीख सिखाये
दूजा पितृ से लीजिये, जो जीवन त्रुटि सुधाये।

तृतीय ज्ञान मिले गुरु से, जो समाज सम्मान बढ़ाये
जब तक जीवन जिये रे मुसाफिर, ज्ञान की राह दिखाये।

ज्ञान की ज्योत ज्यूँ जले,कुबुद्धि सुबुद्धि बन जाये
ज्ञान बिना एक राजा ,स्वत: नष्ट हो जाये।

प्रभु दिया ये परम आशीष , जो भी नर अपनाए
बल पाए वो बुद्धि का, दो घड़िया अन्न कमाए।

सीख यही मैं दीजिये, आधा ज्ञान न कभी पाए
पूरा ज्ञान ही लीजिए, जो भरपूर लाभ दिलाये।

संग ज्ञान अहम न आये,ये बात जो समझ जाएं
न हो कोई वाद विवाद, न घर परिवार टूटी जाए।
                                      ~प्रियंका"श्री"
                                         13/10/17

Wednesday, December 6, 2017

विधवा


          

सफेद साड़ी में जड़ी
मासूमियत चेहरे पर धरी
डरी-डरी सहमी सी
दृष्टि बचाकर चली

साज श्रृंगार से दूर
कांतिविहीन मुखमंडल धरे
रंग बिरंगे परिधानों को
परित्याग किये हुए
चेहरे पर भयावह धरे हुये
अकेली-अकेली रही

साज श्रृंगार
की उम्र में
हाथों की चूड़ियां गई
पांव की पायल गई
माथे की लाल बिंदिया गई
लाल ओढ़नी की चमक गई

हर सुख से वंचित
हर चाह से विमुख
बंदिशों में जकङी
आँखों में सदा लिए आँसू
दुखियारी रह गई

घृणा का पात्र बनी
अपशब्दों से बुनी
शगुनों में जो पहले गिनी
अपशगुनी कहि गई

चरित्रवान रही
फिर भी चरित्रहीन समझी गई

अंधकार मय जीवन में
न जाने क्यों
धकेली गई

परंपराओ में घिरी
इंसानियत ढूँढ़ती फिरी

दुखों से परिपूर्ण
अधीनस्थ वो
ठगी-ठगी सी
बेबस हो चली

न कोई अपना
न पराया
हर इच्छा की
बलि दे चली

अपनों की सेवा
मन मे बसाये ,
सब सहते हुए
जी चली

किस्मत थी उसकी
विधवा होना
पर कर्म जिसमे
खुशियां थी
अब भक्ति भरने लगी

न खुशियों की लालसा
न उच्च जीवन की
अभिलाषा
दुख में भी सुख
की तलाश कर
ईश्वर का यही
निर्णय मानकर
काटों रूपी राह पर
चल पड़ी

नाम होते हुए भी
विधवा नाम से जानी गई
श्रापित न होकर भी
अभिशप्त हो गई।।
                       ~प्रियंका"श्री"
                          4/12/17










Tuesday, December 5, 2017

यादें

     यादें
नमक सी
नमकीन,
इमली सी
खट्टी,
रसगुल्ले के सीरे सी,
मीठी-मीठी,
हरी मिर्ची सी
तीखी-तीखी,
होती हैं यादें।
कभी आसुँयो में
भीगी सी,
कभी चेहरे पर खिलती
हंसी सी,
कभी चिंता में
डूबी सी,
होती हैं यादें।
आती हैं जब
याद यादें,
मीठा सा दर्द दे जाती हैं।
कभी दिल बैचैन,
तो,
कभी होठों पर
मुस्कान बन,
खिल जाती हैं।
कभी-कभी,
दिल को,
गुदगुदा जाती हैं।
तो कभी मन में,
रोष जगा जाती हैं।
ऐसी होती हैं,
यादें।
आती हैं जब,
याद यादें।
न जाने कितने
भावों में सिमट
जाती हैं।
जैसी भी हो
यादें ,
जब भी याद आती हैं,
अपनों परायों का फर्क
भूल जाती हैं।
न जाने कितने,
अरमान जगा जाती हैं।
छूट जाते हैं जो,
बरसों से,
यादें ही उनको
यादों में,
मिलवा जाती हैं ।
रूठना मनाना,
सब छुपा होता हैं
यादों में,
जीवन के अतीत की
कहानी कह जाती हैं।
भूल भी जाये गर इन्हें,
यादें तो यादें हैं
सदा साथ निभाती हैं।
खुशकिस्मत होते हैं वो,
जिनके पास यादें रह जाती हैं।
कभी जीवन जीने की,
प्रेरणा बन जाती हैं,
तो कभी ,
उदास मन को,
खुशी दे जाती हैं।
ऐसी होती हैं यादें,
आती हैं जब,
याद यादें।
चलों मिलकर हम,
ऐसी यादें का,
निर्माण करें।
जब भी स्मृति हो,
उन यादों की।
तो दिल में सम्मान हो,
मन में सुकून हो,
जो होठों पर मुस्कान करे।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                          27/9/17

Monday, December 4, 2017

न काटो हमको काट के तुम क्या पाओगे

       न काटो हमको काट के तुम क्या पाओगे
सुखा सा पेड़ ,
दल,पुष्प मुक्त ,
किये धारण शाखाएं।
पृथ्वी में जड़ जमाये,
अकड़ कर खड़ा ।
पर,
नयन अश्रु से भरे उसके,
प्रतीत ऐसे आंखों को आये।
देख-देख जब चारों दिशाओं,
सोच विचार बारम्बार करे।
मुझमे अब कोई जीवन नही ,
फिर भी खड़ा निहार करे।
देखते ही देखते,
कट गए हरे भरे पेड़ सारे।
जीवनयुक्त पेड़ पौधों का,
क्यों न तू सम्मान करें।
तू समक्ष मेरे काट रहा,
हरित स्कंध ,
तुझे दया उन पर न आये।
क्यूँ बुद्धि से हटके तू ऐसे काम करें,
क्या भविष्य से अवगत नही तू,
या जानबूझकर ऐसे क्रियाकलापों में पड़े।
मैं ही आरम्भ और अंत भी मैं,
आधार भी मैं,
मेरे बिना कही जीवन न पाया जाए।
हरियाली बिन जीवन कैसा ,
निर्बुद्धि तुझे ये समझ क्यों न आये।
अपनी ही जाति को,
दुर्भाग्य के अंधेरों में डाल तू रहा।
हम बिन न पायेगा स्वच्छ वायु भी,
इस ओर ध्यान तेरा क्यों न जाये।
क्यों अपनी ही मानव जाति का,
तू सर्वनाश करें।
कैसे मिटा पायेगा अपनी भूख,
गर हम सब कट जायेंगे।
बिन पेड़ पौधों के जब,
बादल भी न बन पाएँगे,
न चमकेगी बिजली,
न बारिश के मौसम आएँगे।
जब न रहेगे हम,
हो जाएगी बंजर ,जमीन।
न मिलगे स्वादिष्ट फल,
न अनाज उग पायेंगे,
उपचार की जड़ीबूटियां के लिए भी,
तरस तब तुम जाओगे।
हमे काटकर ,अपना निवास बनाकर भी,
सुख चैन स्वस्थ जीवन न पा पाओगे।
बिना हमारे,
सूरज की तेज गर्मी की आंच
से भी न बच पाओगें।
न मिलेगी तब छाँव तुम्हें,
तब तुम बहुत पछताओगे।
न काटो हमको,
काट कर तुम क्या पाओगे।
अपने ही जीवन के अंत
की कहानी,
तुम खुद लिख जाओगे।
तुच्छ तू रह जायेगा तब,
जीवन हीन होकर।
तब किये ऐसे कर्मो का,
पछतावा ही रह जायेगा,
उस वक़्त चाह कर भी,
ऐसी हरियाली उगा न पाओगें।।
                                    ~प्रियंका"श्री"
                                       4/12/17

Friday, December 1, 2017

मन उत्साहित कर जाये


मन उत्साहित कर जाये

चतुर्दिक बहती पवन
व्याप्त उसमे मीठी सुगंध     
छू जाए जब अन्तः करण   
मन उत्त्साहित कर जाये।

उदय दीवाकर पूरब से
छटा गुलाबी हल्की सी
क्षितिज भर में जो बिखराये।

देख अनुपम ये दृश्य
मन उत्साहित कर जाये।

पत्तों पर पड़ी ओस की बूदें
उन पर पड़तीं सूरज की किरणें
दल की जो कांति और बढ़ाये।

प्रत्येक दल की सुंदरता में
चार चांद लग जाये।

आकर्षण युक्त ,प्राकृतिक सौंदर्यता
मन उत्साहित कर जाये।

चांद की चांदनी में लिप्त
कलियों को निशा
जब खुद में समाये।

पड़ती सूरज की किरणों से
जब कली फूल बन जाये
देख ये अलोकिक परिवर्तन
मन उत्साहित कर जाये।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           1/12/17
                     








कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...