Tuesday, October 31, 2017

जिंदगी जब मायूस लगने लगे

जब सिर्फ साँसों पर चलती है जिंदगी
मौत से बत्तर होती है जिंदगी

न उमंग ,न तरंग
न किसी को पाने की चाहत
न किसी को खोने का गम
बस बिना वज़ह बढ़ती है जिंदगी
मौत से बत्तर होती है जिंदगी।।

सुख दुख उस पल एक समान होते है
न कोई अहसास,
न कोई भाव होते है
चिंताओं से ग्रसित हम बेजान होते है
बिना मंज़िल के रास्तों पर बढ़ती जाती हैजिंदगी
मौत से बत्तर हो जाती है जिंदगी।।

दो पल भी न ठहरती है
न कुछ कहती ,न सुनती है
बस बेजान ख़्वाब सा छोड़ जाती है जिंदगी
मौत से बत्तर हो जाती है जिंदगी।।

Sunday, October 29, 2017

किन्नर

mycity4kids Check out this interesting blog post "किन्नर" by Priyanka Srivastava. Read Here: https://www.mycity4kids.com/parenting/shri-ki-abhivyakti/article/kinnara

Friday, October 27, 2017

अनाथ हूँ मैं

अनाथ मैं,
हूँ वंचित सच्चे प्यार से
न समक्ष मेरे
माँ पिता का चित्र
हूँ अनभिज्ञ अपने आप से
न अपने अस्तित्व का ज्ञान है
न अपने जन्म का प्रमाण है
राह बस ताकता हूँ हर घड़ी
आये मुझे भी ले जाये कोई
दे अपनों सा लाड़ प्यार
हुकुम भी मेरा
सिर उठाये कोई
हर वक़्त नज़रें
उनको ही ढूँढती हैं
जब भी आता है
अनाथालय कोई
शायद हो यही मेरा अपना
बनाले मुझे अपना कोई
वक़्त ऐसा भी आता है
मुझे भी कोई अपनाता है
साथ जिसके रहता हूँ मैं
प्यार जिसको करता हूँ मैं
कहता हूं वो मेरे माता पिता हैं
उनका अकेलापन दूर करता जो  हूँ मैं
फिर किस्मत रुठ मुझसे जाती है
उनके घर उनकी अपनी औलाद आती है
जिस प्यार को मैने पाना शुरु किया ही था
उस प्यार में जंग लग जाती है
फिर हो जाता हूँ बोझ मैं
जिन हाथों से प्यार पाता था
उन से मार खाता हूँ मैं
अनाथ हूँ अनाथ ही मर जाता  हूँ मैं।।
                               ~प्रियंका"श्री"
                                  24/10/17

Thursday, October 26, 2017

अंधे की लाठी

शरद ऋतु का महीना आ चुका था हल्की हल्की धूप जहां खुले बदन को गर्मी पहुँचाती ,वही रात की चलती हवाएं ठंड में जमा जाती ।कुछ ऐसे ही पलों को महसूस करते बानो और उसके बाबा।दिन भर भीख मांगकर जो कुछ भी मिल जाता उससे रात में अपना पेट भरते ।पर इतना कहाँ होता कि दो वक़्त का भी पेट अच्छे से भर जाए।कभी कभी तो हद हो जाती जब पूरा पूरा दिन भीख माँगकर भी इतना न मिलता की उदर की आग को दोनों शांत कर सकें।ऐसे में काम आता बस्ती में लगा हैंडपंप ,वही एक आखिरी सहारा बचता। बानो और उसके बाबा दोनों ही एक दूसरे की दुनियाँ थे। जहाँ बानो एक खिली हुई कली से फूल बनने की राह चल रही थी वही उसके बाबा अपनी ढलती उम्र को लेकर आगे बढ़ रहे थे।कहने को बानो एक भिखारी थी पर उसका गोरा चिट्टा रंग उस पर किशोरावस्था की झलकियाँ उसे और मोहित बना रही थी ।अपनी बढ़ती बेटी की चिंता हर पिता की तरह उसके बाबा को भी थी ।पर इस दुनिया मे जहाँ भीख का अंधेरा था वही उसके बाबा की आंख में अंधेरा छुपा था।बनो ही अपने अंधे बाबा  का आखिरी सहारा थी या यूं कहूँ उनकी लाठी। अपने अंधे पन और पेट की भूख से परेशान जब उसके बाबा तिलमिला जाते हमेशा खुद को कोसते और बड़बड़ाते रहते बनो की जिंदगी खराब हो गयी ।एक तो भीख माँगकर खाना उस पर मेरे जैसे अंधे की देखरेख ,कभी कभी तो बानो को खुद से अलग होने को कह देते और कभी कभी मरने की बात कह जाते ।पर इसमे उनका गुस्सा नही अपनी बेटी बनो के लिए प्यार व उसके भविष्य का ख्याल होता जो बोलते बोलते उनका मन टूट जाता और आंखों से बह उठता ।बानो ये सब समझती थी इसलिए जब बाबा गुस्सा करते कभी कभी वो चुपचाप सुनती, वो रोते तो एक माँ की तरह चुप कराती,और कहती बाबा तुम नही होगे ,तो क्या मैं इस दुनियां में जी पाऊँगी ।मुझ गरीब को लोग दो वक्त की रोटी के लिए भी नोच जाएँगे। सत्य बात तो है उसका बाबा भी उस सब बातों से भली भांति परिचित था।
इस तरह दोनों का जीवन किसी तरह कट रहा था। पर विधाता के लिखे लेख कोई नही जानता ,भीख मांगते हुए अचानक बानो को प्यास लगी और वो पानी लेने अपने बाबा को सड़क किनारे बैठाकर दूसरी ओर चली गयी। इसे उसकी किस्मत कहूँ या मानव को मानवता की नज़र न रखने वाला कहुँ एक भीख माँगने वाली लड़की भी कब से ऐसे लोगो की नज़र में होगी कोई नही सोच सकता था । जब काफी देर तक बानो न लौटी तो उसके बाबा परेशान हो गए ,और इधर उधर सड़क पर दौड़ते भागते बनो बनो चिल्लाने लगे अंधे होते हुए भी जो मिलता उसे पकड़ कर पूछते मेरी बनो को देखा मेरी लाठी मेरी बेटी कहाँ चली गयी तू पानी पीने गयी थी अभी तक न लौटी । उनकी वेदना का अहसास किसी को न था । फिर भी पास के कुछ भिखारी उन्हें  पुलिस थाने ले गए । और वहां उनकी बेटी उनके एकमात्र सहारे की रिपोर्ट करायी । पर इन सब की सुध उस बूढ़े को कहा वो तो अपनी बानो को पुकारता रहा ,मानो उससे उसका जीवन छिन गया हो ।पुलिस ने भी उस बूढ़े को ढांढस बधाते हुए कि बहुत जल्द वो उसकी बेटी को खोज निकालेंगे और वो अब घर जाए, थका हारा बूढ़ा भी कहाँ मानने वाला वह उसी जगह जाकर अपनी बिटियां को आवाज़ लगाने लगा , बीच बीच मे भगवान से दो पल के लिए अपनी आँखें मांगता ताकि बानो को ढूढ़ सके।भागते चिल्लाते पुकारते कब दिन से रात हो गयी उन बुझी हुई आँखों को क्या पता , न तो भूख का होश न प्यास का बस मन बार बार कान को ऊँचा करता कहीं से तो बानो की आवाज़ सुनाई दे। पूरी रात बीत गयी और बानो का कोई अता पता नही । उसके बाबा भी उसी सड़क किनारे उसका इन्जार करते रहे ।
जिस भीख के लिए वे यहाँ वहाँ भटकते थे अब वही भीख उसकी हालत देख लोग यूँ ही दे जाते पर अब वह भीख भी उठायी नही जाती । अब तो मन उसके बाबा का बानो में था दिन दिन भर कभी सड़क पर तो कभी पुलिस थाने में बीत जाता कभी कोई पुलिसवाला कुछ खिला देता तो बानो को देखने की चाहत में थोड़ा सा उसके बाबा खा लेते। एक हफ़्ता यूँ ही बीत गया और अगले दिन उसके बाबा के पास ख़बर आयी कि बानो मिल गयी मानो उसके बाबा को आंखें मिल गयी दौड़ता भागता कभी गिरता कभी संभलता वो पुलिस थाने जा पहुँचा। जहाँ उसके कान अपनी बेटी की आवाज़ सुनने को मचल रहे थे उसका माथा चूमने को कर रहा था वहाँ उसको छूने मिला तो उसका पार्थिव शरीर , जिसको एक हफ्ते से कुछ मनचले लड़को ने मिलकर उजाड़ दिया।
ज्यों ही उसके पिता ने उसके शरीर को छुआ मानो उनकी खुद की जिन्दगी खत्म हो गयी उन्हें जब पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि बानो जब पानी लेने गयी तब कुछ लड़को ने उसका अपहरण कर लिया और एक हफ्ते तक उसके साथ ज़ुल्म किये, ये सब वह ज्यादा न सह पायी और कल जब हमें बानो मिली तो तब तक वह मर चुकी थी । जो कान उसकी आवाज़ सुनना चाहते थे , वो उसकी मौत का समाचार सुन रहे थे न जाने कितने सवाल थे उस मन मे जिसकी आंखों का तारा , उस अंधे की लाठी को छीन लिया था । हज़ारो सवालों में बस एक सवाल ही उस बूढ़े ने पूछा, "क्या आपने उन लड़कों को पकड़ लिया है?" तो मैं उन्हें बस छू कर पहचाना चाहता हूँ ।जिन्हें उस मासूम की चीखों से उस पर दया नही आई । क्या कुसूर था मेरी बेटी का जो उसे ऐसी मौत मिली। उसकी बातों का शायद कोई जबाब किसी कर पास शायद था ही नही।

इतना कहकर वह पुलिस थाने से अपने अकेले घर मे चला गया ।

अगले दिन जब थानेदार साहब ने उसे उसकी बेटी का पार्थिव शरीर अंतिम क्रिया  केे लिए ले जाने के लिए हवलदार को भेजा । वहाँ पता चला कि अंधे बाबा भी रात को चल बसे बस ले गए तो मन मे हज़ारो सवाल जो ।

Wednesday, October 25, 2017

गलतियाँ हो रही हैं

गलतियाँ हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये

सीखे हुए हम घोड़े नही
लहराती पकी फसल न सही
नादान है कच्ची मिट्टी की तरह
प्यार से ही ढ़ाचे में ढाल तो दीजिये

कटु शब्दों के तीर से
विचलित होता है मन
कुछ मीठे गीत गाकर
इसे मना तो लीजिए

गलतियां हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये।

हम तो ना कारा
अशुध्दियों से भरे हुए
फलदार वृक्ष की तरह
धैर्य लेकर ही
सही ज्ञान दे ही दीजिए

गलतियां हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           25/10/17

Tuesday, October 24, 2017

विश्वास

धुंध में चलते हुए
सब अंधकारमय दिखने लगा
घबराता मन ललखड़ाते कदम
थमने को यूँ कहने लगा।

डरे हुए नयन जब
होने लगे बन्द
अहसास कुछ
यूँ मन को छू गया।

कह गया मुझसे वो यूँ
कर विदा डर
अपने मन का
खोल पट दोनों
नैनों के।

शंसा न कर
रख विश्वास दृढ़
है ईश्वरीय अंश
तुझमे भी कही।

बंद नयन यूँ खुल गए
ठहरे कदम यूँ चल गए
धुंध में भी
प्रकाश ज्योति पुंज
कुछ यूँ दिखा
मानो परमात्मा थामे हाथ मेरा
मुझे आगे बढ़ चला।।
                    ~प्रियंका"श्री"
                      25/10/17

नारी

नारी सहनशीलता ,ममता की देवी
अपिरिचित अपने अस्तित्व से
जन्म से जुड़ा पिता का नाम
विवाह पश्चात जानी पति नाम से
कुछ नही उसका कुछ अपना
फिर भी सब कुछ संजोया जानकर अपना
जिन माता पिता ने पाला पोशा
उस पर भी न हक़ है उसका
हर वक़्त कहि जाती है वो
अमानत है तू किसी ओर के घर का
जिस घर व्यहि गयी बड़े चाव से
उस घर भी परायी कहलाई
जीवन पूरा दे दिया जिस घर को
अंत समय तक भी वो इज्जत न पायी
महान है ये रूप ईश्वरी
सब सहकर भी करती गयी।।

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...