Tuesday, November 14, 2017

भिखारी

ढला हुया चेहरा
बुझी हुई आँखे
फटे हुए होठ
बिखरे हुए बाल।

फटे हुए कपड़े
जो ढंग से तन भी
नही छुपा पाते।

हाथ फैलाये
हर सिग्नल,हर बाजार
में हमसे ये टकराते।

कभी ठुकराते
तो कभी मुँह फेर जाते।

दया गर आती
दो पैसे हम दे जाते।

यह मजबूरी है उनकी
या धंधा है ,
जीवन यापन का ।

बात कठिन है
समझ इसको पाना।

कभी करुणा कभी रौद्र
इन रसों से परिपूर्ण।

मन के भाव
जिन्हें इनको हम दिखलाते।

हर एक के पास जाकर
अपनी भूख मिटाने की बात
जो ये कह जाते।

इस परिचय को पूर्ण
करते ये ।

भिखारी है कहलाते।।
                15/11/17
               ~प्रियंका"श्री"

Monday, November 13, 2017

नारी


रूप में मनभावन,
आकर्षण की देवी,
भले सुकोमल मन
तुम्हारा।

तन से भी कमजोर नहीं,
मन से सुदृढ़ सदा ,
अपार सहन शक्ति
हैं तुझमें।

स्वाभिमान न कभी
अभिमान बना।

सृजन का है वरदान तुम्हें
सपनों का अपने,
करती है बलिदान की सदैव।

तू ही अन्नपूर्णा, तू ही लक्ष्मी
तू ही दुर्गा, तू ही सरस्वती
तू ही जीवन आधार
है कहलाती।

हर रस से परिपूर्ण है तू,
अलंकार से युक्त है तू,
नमन सदा है तुमको मेरा,
तुम नारी सम्मानीय सदा।।
                       ~प्रियंका"श्री"
                          16/11/17

Wednesday, November 8, 2017

रिश्तों की कमी

पहले के रिश्ते भी
क्या खूब हुआ करते थे
कहने को नहीं
रहनें को सब
साथ हुआ करते थे।

बेगानापन भले जुबां
में दिखता हो
दिलों में तो प्यार बसा करते थे।

दर्द का अहसास खुद से पहले
अपनों को हुआ करता था
आखिर
होठों की हंसी ,आँखों की नमी
से अपनों के दिल जुड़ा करते थे।

नीव का पत्थर परमार्थ,
आदर, समझौता,अपनो का
खयाल हुया करता था
आज के रिश्ते तो स्वार्थ
पर टिके होते है।

आज भी याद आता है वो वक्त
जब बड़ो के वो किस्से कहानी
जिससे दिन रात खिला करते थे।

त्योहारों पर घर मोहल्ला
सा हो जाता था
खुशियों में जब सब एक जगह
हुआ करते थे
हर दिन रौनक से भरा होता था
रातों को अपनो के ख्वाब
हुया करते थे।

जी करता है काश !
आज फिर वो पल मिल जाये
जो अपनों को अपनों
से जोड़ जाये।

हर शिकवे गीले भुला कर
सबको एक तार में बांध दू
डोर चुनूँ भी ऐसी जिसमे
टूटने की कशिश न रह जाये
बांध चले जो सबको एक सा
मन में किसी के भी
एक भेद न बस पाए।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                          8/11/17

Monday, November 6, 2017

आरक्षण की महिमा

कहा प्रभु ने जीवात्मा से
वक़्त तेरा धरती पर
जन्म का आया है
मेरा आशीर्वाद है तुझे
जन्म तेरा उच्च कुल में होने वाला है।

सुन वत्स चिंतित होकर
बोल पड़ा भगवान से
आरक्षण नामक राक्षस
धरती पर पाया जाता है
धरती पर उच्च कुल में पैदा होना
मौत से बत्तर हो जाता है
दिया वरदान आपका यह
अभिशाप सा प्रतीत होता है।

अचंभित होकर प्रभु ने
कारण इसका पूछ लिया
भगवान के निवेदन पर वत्स
ने उनकों ये उत्तर दिया।

पूरी कहानी आरक्षण की आज में
आपको सुनता हूँ
सामान्य वर्ग की विरह वेदना
आज मैं आपको बताता हूँ।

दीन दलित लोगों के
सुधार के लिए इसे जन्मा था
दिलाने समाज में मान सम्मान
इसको आगे रगड़ा था
जब इसने पूरी धरती पर
अपना पैर पसारा था
धरती पर आरक्षण नामक
एक असुर तब अस्तित्व में आया था
धीरे धीरे जिसने सामान्य वर्ग
को अपना आहार बनाया था।

आज न कोई दीन
न दलित बच पाया है
दीन दलित की श्रेणी में
अब सामान्य वर्ग आया है।

आरक्षण के इस खेल में
न जाने कितने हीरे पत्थर रहे
और न जाने कितने पत्थर को
हीरे की भांति दिखलाया है।

हर क्षेत्र में अब इसका
ही बोल बाल है
जिसको न ज्ञान सही से
उसके हाथों में उद्धार दे डाला है।

वत्स रोते हुए-

अभी तक तो सरकारी ,शिक्षा के क्षेत्र में
ही ये मौजूद था
सुना मेने अब तो निजी क्षेत्रों
के लिए भी ये चुना गया
ऐसे में कैसे प्रभु मैं
जीवन यापन अपनों का कर पाउँगा।

अतः विनती आपसे
बस यही अब कह पाउँगा
जन्म मुझे गर देना
तो दलित वर्ग में ही देना
वरना मुझे कभी भी धरती पर
जाने को मत कहना।

जान आरक्षण की महिमा
प्रभु भी चिंतित हो गए
सोचा अगर ये धरती से
स्वर्ग लोक में आ गया।

क्या होगा ये सोचकर भी
मन उनका घबरा गया
सबसे अच्छा इस असुर को
धरती पर ही रहने दो
वत्स ये वर में देता तुमको
इसको दलित वर्ग में
ही जन्म लेने दो।

वर सुनकर जीवात्मा
अत्यंत प्रसन्न हो गई
धरती पर आरक्षण नाम के
असुर से जो वो बच ग।।
                           ~प्रियंका"श्री"
                              7/11/17

Sunday, November 5, 2017

कलयुगी शिक्षक

शिक्षक नाम आते ही हमारे सामने "एक सज्जन, सदाचारी, आत्मविश्वास से युक्त,पूर्ण तार्किक, विषय वस्तु के जानकार और ज्ञान के भंडार" ऐसी विशेषताओं से युक्त व्यक्ति का चित्र आँखों के समाने आता है।

जिससे न सिर्फ विद्यार्थियों के माता पिता को व सम्पूर्ण समाज को न जाने कितनी उम्मीदें होती हैं।

इन्हीं उम्मीदों के चलते हम अच्छे से अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिल कराते है कि उस स्कूल में पढ़ाने वाले न सिर्फ ज्ञानी होंगें व सदाचारी भी होंगे।

जो न सिर्फ हमारी संतानों को समाज में रहने ,जीवन यापन करने व मानवता का भी पाठ पढ़ायेंगे। और इसी उम्मीद से हम अपनें बच्चों को बिना किसी संकोच व डर के उन स्कूलों व वहाँ के शिक्षकों के सुपुद्र कर देते हैं।

क्योंकि न जाने कितने वर्षों से चले आ रहे "गुरु शिष्य के सम्बंध " को पूज्नीय स्थान हम देते आ रहे हैं। और यही कारण है कि हम गुरु को सृजनकर्ता, विस्तारक,व बुराईयों का अंत करने वाला मानते है ,जो इस श्लोक से भलीभाँति प्रतीत होता है-

गुरु: ब्रम्हा , गुरु: विष्णु , गुरु: देर्वो महेश्वरः
गुरु: साक्षात्य परब्रम्ह तस्मयें श्री गुरुवे नमः।।

शिक्षक समाज का आधार है, हमारा समाज आगे कैसा होगा ,इसका बहुत बड़ा चयन गुरु अर्थात एक शिक्षक के ऊपर भी निर्भर करता है। जिसके द्वारा आने वाला समाज कैसा होगा ? यह निर्णय होता है।

पर मेरा प्रश्न आज सब से यह है कि क्या सच में आज के युग का आधार एक शिक्षक है?

क्या सच में शिक्षक को दैव्य तुल्य मानना चाहिए?

जरा आप ही सोचिए ! इस युग मे  बच्चो के ऊपर हो रहे आपराधिक मामलों में जिनमे शिक्षकों का भी योगदान हो रहा हैं, ऐसे में  हम सोचने पर मजबूर नही हो रहें है कि क्या पूर्ण विश्वास के साथ हम अपनी संतानों को शिक्षकों के अधीन छोड़ सकते है ?
(फिर चाहे वह ट्यूशन के रूप में हो या स्कूल के शिक्षक के रूप में)

क्योंकि कई बार देखा गया है कि शिक्षकों पर किया गया विश्वास या तो बच्चों के साथ कि गयी मारपीट के रूप में य की गई दरिंदगी के रूप  में टूट रहा है।

ऐसे में हम सब अभिवावक इतने बुरी तरह से डरे हुए है कि न जाने कब ?...(मेरे हाथ तो लिखते हुए भी नही लिख पा रहे ,सोचना तो बहुत दूर है।)

क्योंकि उस संवेदना को समझना भी बहुत मुश्किल होता है जिस परिवार के बच्चे के ऊपर ये सब घटता है। उस वेदना को, जो वह बच्चा सहता है उसे तो मैं शब्दो में भी व्यक्त नही कर सकती ।

जब आये दिन हम समाचार पत्रों में य टेलीविजन में न्यूज़ में ऐसी खबर पढ़ते है तो कितना डरा हुआ अपने बच्चे व खुद के लिए महसूस करते हैं।
पर दुःख तब यह सब जानकर होता है कि इतना सब प्रकाशित होने के बाद भी कलयुंगी शिक्षक समझता ही नहीं है व अपनी गन्दी मानसिकता के चलते, वह बस अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। और इस पर स्कूल प्रशासन भी कुछ नही करता बस मूक दर्शक बने सब सुनता है ।

ऐसी हो रही घटनाएँ  क्या उन सभी शिक्षकों को भी शर्मशार करती होंगी ,जो एक सच्चे गुरु की तरह अपने विद्यायर्थी को आगे बढ़ना चाहतें है। अगर जबाब हाँ है ।तो ये उनकी  जिम्मेदारी बनती है कि अगर ऐसी घटना या किसी छोटी से छोटी हरकत किसी भी शिक्षक या स्कूल के किसी भी स्टाफ की ,उनको गलत लगे तो तुरंत प्राचार्य या उस विद्यायर्थी के घरवालों को सूचित करें।

क्योंकि कहते है ना अगर हम सूंदर फूलों की माला बनाना चाहते है तो हमे पहले उसकी मिट्टी व काँटो को फूलों से दूर करना होगा।

न सिर्फ शिक्षकों को व माता पिता व हर इंसान को एक दूसरे, खास कर बच्चो के प्रति संवेदनशील व जागरूक होना होगा।

अब अपने लेख में बस इतना कहना चाहती हूँ कि-

जान कर अन्जान बनना छोड़ दीजिये
अपने नाम का सही मान रख लीजिए
न कीजिये शर्मशार गुरु शिष्य रिश्ते को
फिर से करें हम पूर्ण विश्वास
ऐसा कर्त्तव्य निर्वाह कर दीजिए
आप है आधार इस समाज निर्माण के
कुछ तो उदाहरण ऐसा पेश कीजिये
कर सकें हम गर्व आज भी आप पर
पूज्य सके दैव्य तुल्य आपको
ये सब है आपके हाथ में
इस तरफ भी थोड़ा सोचिए विचार कीजिये।।
                                      
                                     ~प्रियंका"श्री"
                                         6/11/17






बहुत वक़्त बाद.....

बहुत वक़्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है
अपेक्षाओं पर सबकी न
खड़े होने पाने का दुख
न खुद पर जताया है
बहुत वक़्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है।
जो हर पल बीत जाता था
यही सोच कर
क्या करें ऐसा जो हम पर
भी प्यार हो उन सबका
थकते कदमो ने अब रुक जाना
ही बेहतर पाया है
मेरे साये ने मुझमे रहकर
मुझे पाने का हक़ जताया है
बहुत वक्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है।
टूट कर भी जब उनकी
उम्मीदें पूरी करते चले थे
फिर भी कुछ न कर ,पाने का गम
हमने जो उनसे पाया है
रास्तों ने समझा मुझे
आह! अपनों ने जो ठुकराया है
बहुत वक्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है।
वक्त का असर कुछ यूँ छाया
जो खुश थे दौलत शोहरत से हमारी
चले जाने का गम खुद से ज्यादा उनमे पाया है
थकते नही थे जो
तारीफों के कशीदे कसना हमारी
आज बात करना भी उन्होंने मुनासिब न पाया है
बहुत वक्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है।
देख अपनो से भरी दुनियाँ का ये चेहरा
हमने खुद मे रहना ही मुनासिब पाया है
आज वक़्त जिसने हमें
खुद से खुद को मिलाने का जो जिम्माा उठाया है
खुद से खुद की बातों का
मजा लेने का जो आया है
बहुत वक्त बाद आज
खुद को खुद से मुक्त पाया है।।
                         ~प्रियंका"श्री"
                           6/11/17

Wednesday, November 1, 2017

मानसिकता

                          मानसिकता

मानसी -दीदी किस चिंता में इतनी गहराई से सोच रही हो।
सब ठीक है ना ?
मानसी ने अपनी बड़ी बहन संगीता की ओर देखकर पूछा।
दीदी(संगीता)- हाँ मानसी ,घर में तो सब ठीक है।

बस मुझें यकीन नहीं हो रहा ! कि हम सच में एक आधुनिक समाज में हैं ।या सिर्फ आधुनिकता का चोला पहनें उसका दिखावा करतें रहतें है।

संगीता की इस तरह की बातें सुनकर मानसी को पूरी बात तो समझ नहीं आई ,पर ये जरूर पता लगा कि कोई तो गहरीं बात है।
जिसने दीदी की आत्मा को अंदर तक छकछोर दिया हैं।

अतः मानसी ने अपनी उत्सुकता को समाप्त करने के लिए संगीता से पूरी बात बतानें को पूछ ही लिया।
मानसी- दीदी आख़िर बात क्या है? कृपा पूरी बात बताएं।
पूरी बात जानकर जो सच सामनें आया , जिसे आसानी से भूल जाना संभव नहीं था ।
दीदी (संगीता)ने बताया कि आज से दो दिन पहले कम्मों सुबह उनके घर आकर पूरा काम बड़े खुशी से कर गयी ।
मैं (मानसी)-आपको बताना भूल गयी "कम्मो संगीता दीदी के घर उनकी घर के कामों में मदद करने आती है "

एक तरह से तो हमारी सोच के अनुरूप "वो एक काम वाली है पर मेरी दीदी को काम वाली कहना व सुनना पसंद नही ।उनका कहना है, कामवाली वो कैसे हो सकती है ,जबकि उसे हम खुद अपने घर के कामों में मदद के लिए बुलाते हैं। इसलिए मैं भी कम्मों को एक सहायक ही कहूंगी दीदी की।"

चूँकि मैं कह रही थी कि कम्मों दीदी के यहां सुबह व शाम दोनों वक्त आती है अतः जब वह शाम को दीदी के घर आई तो बड़ी ही गुस्से में थी ,उसका गुस्सा चेहरे पर साफ छलक रहा था ।उसका चेहरा देख कोई भी समझ जाता ,कि आज कुछ तो बहुत गलत हुआ है ।
यही कारण था, कि मेरी दीदी भी समझ गयी और कम्मो से पूछ डाला ,कि क्या हुआ ? सुबह तो कितना चहक रही थी। शाम तक ऐसा क्या हो गया ,कि सुबह की हंसी गुस्से में परिवर्त्तित हो गयी। संगीता दीदी की बात सुन कम्मो की आंखों में आँशु आ गए और विलख  विलख कर रोने लगी ,दीदी को समझ न आया ,कि ऐसा क्या हो गया ? अतः उन्होंने कम्मो को संभालते हुए प्यार से पूछा , क्या बात है ? बता ना ।
इतना क्यों रो रही है ?
तेरे ऐसे रोने से मेरा दिल बैठा जा रहा है। तभी कम्मो ने आंखों से आँशु पोछते हुए बोला , दीदी मैं आपके यहां पूरे एक साल से हूँ। अपने मुझे कभी अपनी काम वाली नहीं समझा ,हमेशा इस घर के एक सदस्य की तरह ही मान दिया। इसलिए शायद मैं ही अपनी जगह भूल गयी , मैं भूल गयी थी,  कि "मैं एक कामवाली हूँ" । जो सिर्फ यहां कुछ पैसों के लिए काम कर रही है । उसकी बात सुनकर दीदी ने उसे पूरी बात सही सही बताने को कहा , उसने बताया आपके यहाँ से काम करके ,मैं तिवारी दीदी के यहां काम के लिए गयी, वैसे तो आपके यहाँ मैं ,चाय व पानी सब पी कर जाती हूँ। तो मुझे कुछ भी मांगने की जरूरत नही होती । परन्तु आज वहाँ मुझे बहुत प्यास लगी ,
तो मैने (कम्मों)तिवारी दीदी से पीने के लिए पानी मांगा।अतः मेरे कहते ही दीदी पूरी किचन में न जाने क्या खोजने लगी ।
मैंने बड़ी हिम्मत से पूछा -दीदी मैंने तो पानी मांगा है , जिसके लिए गिलास , स्टैंड पर और पानी की बोटल गैस के पास रखी है ,तो आप क्या खोज रही हो?
तभी संगीता दीदी ने बड़े ही अचम्भित होकर पूछा?
फिर तिवारी दीदी ने क्या कहा?
कम्मो का उत्तर सुन संगीता दीदी की भी आँखों में भी गुस्सा व आश्चर्य की भावना आयी।

कम्मो ने बताया -कि उन्होंने एक प्लास्टिक का गिलास खोज कर मुझे उसमे पानी दिया।

मुझे बुरा लगा तो मैने कह दिया -कि दीदी आप इस प्लास्टिक गिलास के लिए परेशान थे ।आप बता देते तो मैं पानी कही और से पी आती।

मेरी बात सुनकर तिवारी दीदी को गुस्सा तो आया ,लेकिन अपना गुस्से को न दिखाते हुए वे  बोल पड़ी- कम्मो बुरा न मानना ,क्या स्टील के गिलास में तुझे पानी देती ?
उसमे घर परिवार के लोग पानी पीते है उसमें तुम पानी नही पी सकती ।
देखों न ,तुम लोगो की न जात का पता ,न कुछ पता ।न जाने  किस किस के घर क्या क्या काम करती हो ।और इससे पहले न जाने क्या क्या काम किये होंगे ?
इसलिए तुम्हे स्टील के ग्लास में पानी देकर मैं अपना ग्लास सेट खराब थोड़ी न करूँगी।

कम्मों ने संगीता दीदी से कहा - कि दीदी आज तिवारी दीदी की बात सुनकर मुझे मेरी औकात समझ आ गयी।कि इंसान की पहचान आज के युग मे उसके कर्मो से होती है ।मेरा काम छोटा है इसलिए मेरी पहचान छोटी है,इसके बाबजूद जो लोग छोटी जात के होकर बड़े कर्म करते है उनके साथ तो सभी उठते बैठते हैं।
अतएव इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद भी देती हूँ ।
और अपने मन में वचन लेती हूँ कि जो मेरे काम के कारण मुझसे यूँ व्यवहार करेगा मुझे इंसान नहीं समझेगा उसके यहाँ मैं भी सिर्फ कामवाली की ही तरह अब रहूंगी आखिर ऐसे घर में मैं क्यों अपना पन दिखाओ?
बताओ दीदी क्या मैं गलत कह रही हूँ?

कम्मो की पूरी बात सुनकर संगीता दीदी ने कम्मो को तो यह कह कर समझा दिया कि, हर व्यक्ति की अपनी अपनी सोच होती है "जिसे मैं सही समझू "जरूरी नही वाकी लोग भी उसे सही माने। तो अपना दिल छोटा मत कर और जो भी खाना पीना हो मेरे घर कर लिया कर।
और उसे शान्त कराया। वो तो संभल गयी पर दीदी के हृदय में लाखों सवाल छोड़ गई।

क्योंकि जिस तिवारी दीदी स्वयं ही एक शिक्षिका है और न जाने कितनी जाती और धर्म के बच्चों को ज्ञान देती है ।पर उनकी खुदकी सोच इतनी कुंठित होगी ये सोच ,दीदी की चिंता का कारण थी। कि जब शिक्षक ही ऐसी सोच के वशीभूत होंगे तो हमारा समाज किस ओर जाएगा।

अतः दीदी की बात ,कि हम सब आधुनिकता में तो जीवन जी रहे हैं।और शिक्षित भी हो रहें हैं।
पर हम नहीं बदल रहें तो अपनी मानसिकता ,जिससे न सिर्फ हम खुद को व समाज की सोच को भी कुंठित कर रहे हैं। और आने वाली पीढ़ी को भी यही मार्गदर्शन दे रहे हैं।यह सच्चाई है यह हमारी सोच का बहुत बड़ा विषय है ।
             ~प्रियंका"श्री"
               1/11/2017

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...