Wednesday, April 25, 2018

शायरी


 किताबों से रिश्ता,लफ्जों से मोहब्बत 
पन्नो की खुशबू,ये नज़्मों की रवायत,
खुशकिस्मत हैं वो लोग जिन्हें मिलती है 
खुदा की ये इनायत।                     प्रियंका"श्री"
                              24/4/18

Tuesday, April 24, 2018

किताबें

किताबों से रिश्ता मेरा ,उतना पुराना है,
जितनी पुरानी है ,उसके पन्नो में रखे हुए
फूलों की खुशबू,
जितना पुराना मुरझाया गहरे रंग का वो फूल,
जिसका अक़्स आज भी
मेरी किताब के पन्ने पर छपा हुया है
जितनी पुरानी है मोहब्बत मेरी
जितनी पुरानी है इबादत मेरी,
मेरे ख़ुदा के लिए,
जितनी पुरानी है वो शायरी,
जो आज तक भूली नहीं गयी,
ये रिश्ता मेरा ,मेरी किताबों से ,
मेरी पहली इज़हारे मोहब्बत है।
                      प्रियंका"श्री"
                      24/4/18
              
                        

Monday, April 23, 2018

शायरी

ये तो उस ख़ुदा की खुदाई ठहरी ,
मेरी मोहब्बत की सच्चाई ठहरी,
जो ख़ुदा ने हम पर यूँ रहम किया।
वरना वो तो आफ़ताब ठहरा,
उसे छूने का हममें कहा दम था।
                            प्रियंका"श्री"
                            24/4/18

Wednesday, April 18, 2018

कह दो

मैं भी हूँ,
तुम भी हो,
और वो अधूरी बात भी है।
मैं भी यहाँ,
तुम भी यहाँ,
और ये चाँदनी रात भी है।
रात के अंधेरे में
चाँद की पहरेदारी में
उन असँख्य सितारों
की टिमटिमाती रोशनी में
कह दो।
कह दो,
जो भी हो दिल मे,
उसे मत रोको,
जो छुपा रहे हो बरसों से,
उसे आज जुबान पर रखकर,
दिल की धड़कनों को बढ़ाकर,
कह दो मुझे।
क्या पता?,
क्या पता ?,
कल ये रात हो न हो,
तुम्हारी मेरी बात हो न हो,
आज ये साथ है,
कल ये साथ हो न हो।
फिर ये अधूरी बातें,
महज़ अधूरी याद बन जायेंगी,
जो तुम्हारी रूह में ही,
सिमट कर रह जाएंगी।
फिर तलाशोगे भी तुम,
वक़्त वो पहला,
जो मिल न पायेगा तुम्हें,
तो ये अधूरी बात,
सदा के लिए ही,
एक अधुरा ख्वाब बन जाएगी।
गर पहुँचा न सके मुझ तक ,
ये अधूरा ख़्वाब तुम,
तो ये ख़्वाब हमारी जिंदगी की कयामत की ,
आखिरी रात बन जाएगी।
                               प्रियंका "श्री"
                               17/4/18

Tuesday, April 17, 2018

क्या मैं इंसान नही ....

क्या तरीका सोचा है लड़कियों से छुटकारे का।
पहले गर्भ में मार देते थे,पर उस वक़्त मेरे अजन्मे शरीर के टुकड़े ,अपने ही करते थे या करवाते थे ।
तब भी मैं तड़पती थी।
बस उस वक़्त मेरी पीड़ा,मेरा छिन्न भिन्न शरीर किसी को दिखता नही था।
अब जब बाहर आ भी जाती  हूँ तो
मेरे जिस्म को नोच नोच कर, मेरे सपनो को
मेरी चीखों के साथ खत्म अब भी तो वो कर देते है जिन्हें मैं या तो जानती नही या जो मुझे अपना मानते नही।
बस अब मेरा घायल जिस्म सबके सामने रहता है मेरी जरूरत हैवानियत के लिए ही क्यों है इस धरती पर ? क्या मुझे इंसान नही माना जा सकता?😢😢😢😢😢😢

एक लड़की

Monday, April 16, 2018

ख़्याल

गैरों की बस्ती में
हमने भी अपना मकान खरीदा।
इस ख़्वाहिश में,
कि गैरों को हम अपना बना ही लेंगे।
देखो आज,
मकान भी टूट गया,
बस्ती भी छूट गयी।
गैर-गैर ही रहे,
बस हम समझदार हो गए।
                       प्रियंका"श्री"
                       27/3/18

Friday, April 13, 2018

शायरी

ये तो उस ख़ुदा की खुदाई ठहरी
जो उसने हम पर यूँ रहम किया
वरना वो तो आफ़ताब ठहरा
उसे छूने का हममें कहा दम था।
                           प्रियंका"श्री"
                           13/4/18
                    

Wednesday, April 11, 2018

बैचैन कलम

आज बैचैन थी कलम मेरी
चैन-ओ-सुक़ून ढूंढ़ रही थी।
पा लिया था उसने ,चैन-ओ-सुक़ून
जब जाकर वो ,कागज के पन्नों से
मिली थी।
स्याही सा खून जब
पन्नों के दिलों में जा उतरा था।
दूर हो गए थे वो सारे गिले शिकवे
जब कागज कलम से जा मिला था।
मिलकर उनके तब जन्म
एक ऐसी नज़्म का हुया था।
जिसने कागज क़लम को पूर्ण,
और ख़ुद को आबाद किया था।
आबाद भी खुद को उसने कुछ
इस कदर किया था।
कि जब जब चढ़ी वह लोगों की ज़ुबान पर
वाह वाह से उसे नवाजा गया था।
               प्रियंका"श्री"
              27/2/18

Tuesday, April 10, 2018

विचार

सद्गुरु दे हमकों गुरुवाणी
हम भी बैठे सुनते हैं
ज्ञान कहाँ से आये हृदय में
जब हृदय में अवगुण बसते हैं
न सार्थ हो गुरुवाणी का
न सार्थ हो ऐसे सत्संग का
जहां बैठ सुनता हर कोई
अमल नहीं पर करते हैं
                   प्रियंका"श्री"
                   11/4/18

Wednesday, April 4, 2018

शायरी

गैरों के लबों पर जब सज जाती है बातें हमारी
यक़ीन मानिये जिंदगी में जिंदा होने का सबब बन जाती है
                                             प्रियंका"श्री"
                                             5/4/18

Tuesday, April 3, 2018

ख़्याल

जिंदगी आसान समझ ली थी उसनें शायद
तभी इतना बेपरवाह हो गया।
जिस दौड़ में भागा था वो, निकलने को आगे
जान भी न सका ,कब उस दौड़ से गायब हो गया।
                                      प्रियंका"श्री"
                                      4/4/18

Sunday, April 1, 2018

विचार

मेरे खव्वों की दुनियाँ छोटी नहीं थी,
कर गुजरने का हौसला भी असीम था,
कमी बस यही रह गयी थी कि,
हाँथो में मेरी जिंदगी की
लकीर छोटी बस गयी थी।

फिर भी एक सुकून रहेगा मुझे
जो कुछ कर गुजर गए
क्या खूब कर गुजर गए
छोटी सी जिंदगी में ही अपना
नाम कर गए।
                    प्रियंका "श्री"
                    1/4/18

कविता

जब जब सोचा   आखिरी है इम्तिहान अब ।  मुस्कुराकर मालिक ने कहा   खाली जो है  बैठा  दिमाग उसका शैतान है उठ चल , लगा दिमाग के घोड़े कस ले चंचल म...