शिक्षक नाम आते ही हमारे सामने "एक सज्जन, सदाचारी, आत्मविश्वास से युक्त,पूर्ण तार्किक, विषय वस्तु के जानकार और ज्ञान के भंडार" ऐसी विशेषताओं से युक्त व्यक्ति का चित्र आँखों के समाने आता है।
जिससे न सिर्फ विद्यार्थियों के माता पिता को व सम्पूर्ण समाज को न जाने कितनी उम्मीदें होती हैं।
इन्हीं उम्मीदों के चलते हम अच्छे से अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिल कराते है कि उस स्कूल में पढ़ाने वाले न सिर्फ ज्ञानी होंगें व सदाचारी भी होंगे।
जो न सिर्फ हमारी संतानों को समाज में रहने ,जीवन यापन करने व मानवता का भी पाठ पढ़ायेंगे। और इसी उम्मीद से हम अपनें बच्चों को बिना किसी संकोच व डर के उन स्कूलों व वहाँ के शिक्षकों के सुपुद्र कर देते हैं।
क्योंकि न जाने कितने वर्षों से चले आ रहे "गुरु शिष्य के सम्बंध " को पूज्नीय स्थान हम देते आ रहे हैं। और यही कारण है कि हम गुरु को सृजनकर्ता, विस्तारक,व बुराईयों का अंत करने वाला मानते है ,जो इस श्लोक से भलीभाँति प्रतीत होता है-
गुरु: ब्रम्हा , गुरु: विष्णु , गुरु: देर्वो महेश्वरः
गुरु: साक्षात्य परब्रम्ह तस्मयें श्री गुरुवे नमः।।
शिक्षक समाज का आधार है, हमारा समाज आगे कैसा होगा ,इसका बहुत बड़ा चयन गुरु अर्थात एक शिक्षक के ऊपर भी निर्भर करता है। जिसके द्वारा आने वाला समाज कैसा होगा ? यह निर्णय होता है।
पर मेरा प्रश्न आज सब से यह है कि क्या सच में आज के युग का आधार एक शिक्षक है?
क्या सच में शिक्षक को दैव्य तुल्य मानना चाहिए?
जरा आप ही सोचिए ! इस युग मे बच्चो के ऊपर हो रहे आपराधिक मामलों में जिनमे शिक्षकों का भी योगदान हो रहा हैं, ऐसे में हम सोचने पर मजबूर नही हो रहें है कि क्या पूर्ण विश्वास के साथ हम अपनी संतानों को शिक्षकों के अधीन छोड़ सकते है ?
(फिर चाहे वह ट्यूशन के रूप में हो या स्कूल के शिक्षक के रूप में)
क्योंकि कई बार देखा गया है कि शिक्षकों पर किया गया विश्वास या तो बच्चों के साथ कि गयी मारपीट के रूप में य की गई दरिंदगी के रूप में टूट रहा है।
ऐसे में हम सब अभिवावक इतने बुरी तरह से डरे हुए है कि न जाने कब ?...(मेरे हाथ तो लिखते हुए भी नही लिख पा रहे ,सोचना तो बहुत दूर है।)
क्योंकि उस संवेदना को समझना भी बहुत मुश्किल होता है जिस परिवार के बच्चे के ऊपर ये सब घटता है। उस वेदना को, जो वह बच्चा सहता है उसे तो मैं शब्दो में भी व्यक्त नही कर सकती ।
जब आये दिन हम समाचार पत्रों में य टेलीविजन में न्यूज़ में ऐसी खबर पढ़ते है तो कितना डरा हुआ अपने बच्चे व खुद के लिए महसूस करते हैं।
पर दुःख तब यह सब जानकर होता है कि इतना सब प्रकाशित होने के बाद भी कलयुंगी शिक्षक समझता ही नहीं है व अपनी गन्दी मानसिकता के चलते, वह बस अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। और इस पर स्कूल प्रशासन भी कुछ नही करता बस मूक दर्शक बने सब सुनता है ।
ऐसी हो रही घटनाएँ क्या उन सभी शिक्षकों को भी शर्मशार करती होंगी ,जो एक सच्चे गुरु की तरह अपने विद्यायर्थी को आगे बढ़ना चाहतें है। अगर जबाब हाँ है ।तो ये उनकी जिम्मेदारी बनती है कि अगर ऐसी घटना या किसी छोटी से छोटी हरकत किसी भी शिक्षक या स्कूल के किसी भी स्टाफ की ,उनको गलत लगे तो तुरंत प्राचार्य या उस विद्यायर्थी के घरवालों को सूचित करें।
क्योंकि कहते है ना अगर हम सूंदर फूलों की माला बनाना चाहते है तो हमे पहले उसकी मिट्टी व काँटो को फूलों से दूर करना होगा।
न सिर्फ शिक्षकों को व माता पिता व हर इंसान को एक दूसरे, खास कर बच्चो के प्रति संवेदनशील व जागरूक होना होगा।
अब अपने लेख में बस इतना कहना चाहती हूँ कि-
जान कर अन्जान बनना छोड़ दीजिये
अपने नाम का सही मान रख लीजिए
न कीजिये शर्मशार गुरु शिष्य रिश्ते को
फिर से करें हम पूर्ण विश्वास
ऐसा कर्त्तव्य निर्वाह कर दीजिए
आप है आधार इस समाज निर्माण के
कुछ तो उदाहरण ऐसा पेश कीजिये
कर सकें हम गर्व आज भी आप पर
पूज्य सके दैव्य तुल्य आपको
ये सब है आपके हाथ में
इस तरफ भी थोड़ा सोचिए विचार कीजिये।।
~प्रियंका"श्री"
6/11/17