Tuesday, October 31, 2017

जिंदगी जब मायूस लगने लगे

जब सिर्फ साँसों पर चलती है जिंदगी
मौत से बत्तर होती है जिंदगी

न उमंग ,न तरंग
न किसी को पाने की चाहत
न किसी को खोने का गम
बस बिना वज़ह बढ़ती है जिंदगी
मौत से बत्तर होती है जिंदगी।।

सुख दुख उस पल एक समान होते है
न कोई अहसास,
न कोई भाव होते है
चिंताओं से ग्रसित हम बेजान होते है
बिना मंज़िल के रास्तों पर बढ़ती जाती हैजिंदगी
मौत से बत्तर हो जाती है जिंदगी।।

दो पल भी न ठहरती है
न कुछ कहती ,न सुनती है
बस बेजान ख़्वाब सा छोड़ जाती है जिंदगी
मौत से बत्तर हो जाती है जिंदगी।।

Sunday, October 29, 2017

किन्नर

mycity4kids Check out this interesting blog post "किन्नर" by Priyanka Srivastava. Read Here: https://www.mycity4kids.com/parenting/shri-ki-abhivyakti/article/kinnara

Friday, October 27, 2017

अनाथ हूँ मैं

अनाथ मैं,
हूँ वंचित सच्चे प्यार से
न समक्ष मेरे
माँ पिता का चित्र
हूँ अनभिज्ञ अपने आप से
न अपने अस्तित्व का ज्ञान है
न अपने जन्म का प्रमाण है
राह बस ताकता हूँ हर घड़ी
आये मुझे भी ले जाये कोई
दे अपनों सा लाड़ प्यार
हुकुम भी मेरा
सिर उठाये कोई
हर वक़्त नज़रें
उनको ही ढूँढती हैं
जब भी आता है
अनाथालय कोई
शायद हो यही मेरा अपना
बनाले मुझे अपना कोई
वक़्त ऐसा भी आता है
मुझे भी कोई अपनाता है
साथ जिसके रहता हूँ मैं
प्यार जिसको करता हूँ मैं
कहता हूं वो मेरे माता पिता हैं
उनका अकेलापन दूर करता जो  हूँ मैं
फिर किस्मत रुठ मुझसे जाती है
उनके घर उनकी अपनी औलाद आती है
जिस प्यार को मैने पाना शुरु किया ही था
उस प्यार में जंग लग जाती है
फिर हो जाता हूँ बोझ मैं
जिन हाथों से प्यार पाता था
उन से मार खाता हूँ मैं
अनाथ हूँ अनाथ ही मर जाता  हूँ मैं।।
                               ~प्रियंका"श्री"
                                  24/10/17

Thursday, October 26, 2017

अंधे की लाठी

शरद ऋतु का महीना आ चुका था हल्की हल्की धूप जहां खुले बदन को गर्मी पहुँचाती ,वही रात की चलती हवाएं ठंड में जमा जाती ।कुछ ऐसे ही पलों को महसूस करते बानो और उसके बाबा।दिन भर भीख मांगकर जो कुछ भी मिल जाता उससे रात में अपना पेट भरते ।पर इतना कहाँ होता कि दो वक़्त का भी पेट अच्छे से भर जाए।कभी कभी तो हद हो जाती जब पूरा पूरा दिन भीख माँगकर भी इतना न मिलता की उदर की आग को दोनों शांत कर सकें।ऐसे में काम आता बस्ती में लगा हैंडपंप ,वही एक आखिरी सहारा बचता। बानो और उसके बाबा दोनों ही एक दूसरे की दुनियाँ थे। जहाँ बानो एक खिली हुई कली से फूल बनने की राह चल रही थी वही उसके बाबा अपनी ढलती उम्र को लेकर आगे बढ़ रहे थे।कहने को बानो एक भिखारी थी पर उसका गोरा चिट्टा रंग उस पर किशोरावस्था की झलकियाँ उसे और मोहित बना रही थी ।अपनी बढ़ती बेटी की चिंता हर पिता की तरह उसके बाबा को भी थी ।पर इस दुनिया मे जहाँ भीख का अंधेरा था वही उसके बाबा की आंख में अंधेरा छुपा था।बनो ही अपने अंधे बाबा  का आखिरी सहारा थी या यूं कहूँ उनकी लाठी। अपने अंधे पन और पेट की भूख से परेशान जब उसके बाबा तिलमिला जाते हमेशा खुद को कोसते और बड़बड़ाते रहते बनो की जिंदगी खराब हो गयी ।एक तो भीख माँगकर खाना उस पर मेरे जैसे अंधे की देखरेख ,कभी कभी तो बानो को खुद से अलग होने को कह देते और कभी कभी मरने की बात कह जाते ।पर इसमे उनका गुस्सा नही अपनी बेटी बनो के लिए प्यार व उसके भविष्य का ख्याल होता जो बोलते बोलते उनका मन टूट जाता और आंखों से बह उठता ।बानो ये सब समझती थी इसलिए जब बाबा गुस्सा करते कभी कभी वो चुपचाप सुनती, वो रोते तो एक माँ की तरह चुप कराती,और कहती बाबा तुम नही होगे ,तो क्या मैं इस दुनियां में जी पाऊँगी ।मुझ गरीब को लोग दो वक्त की रोटी के लिए भी नोच जाएँगे। सत्य बात तो है उसका बाबा भी उस सब बातों से भली भांति परिचित था।
इस तरह दोनों का जीवन किसी तरह कट रहा था। पर विधाता के लिखे लेख कोई नही जानता ,भीख मांगते हुए अचानक बानो को प्यास लगी और वो पानी लेने अपने बाबा को सड़क किनारे बैठाकर दूसरी ओर चली गयी। इसे उसकी किस्मत कहूँ या मानव को मानवता की नज़र न रखने वाला कहुँ एक भीख माँगने वाली लड़की भी कब से ऐसे लोगो की नज़र में होगी कोई नही सोच सकता था । जब काफी देर तक बानो न लौटी तो उसके बाबा परेशान हो गए ,और इधर उधर सड़क पर दौड़ते भागते बनो बनो चिल्लाने लगे अंधे होते हुए भी जो मिलता उसे पकड़ कर पूछते मेरी बनो को देखा मेरी लाठी मेरी बेटी कहाँ चली गयी तू पानी पीने गयी थी अभी तक न लौटी । उनकी वेदना का अहसास किसी को न था । फिर भी पास के कुछ भिखारी उन्हें  पुलिस थाने ले गए । और वहां उनकी बेटी उनके एकमात्र सहारे की रिपोर्ट करायी । पर इन सब की सुध उस बूढ़े को कहा वो तो अपनी बानो को पुकारता रहा ,मानो उससे उसका जीवन छिन गया हो ।पुलिस ने भी उस बूढ़े को ढांढस बधाते हुए कि बहुत जल्द वो उसकी बेटी को खोज निकालेंगे और वो अब घर जाए, थका हारा बूढ़ा भी कहाँ मानने वाला वह उसी जगह जाकर अपनी बिटियां को आवाज़ लगाने लगा , बीच बीच मे भगवान से दो पल के लिए अपनी आँखें मांगता ताकि बानो को ढूढ़ सके।भागते चिल्लाते पुकारते कब दिन से रात हो गयी उन बुझी हुई आँखों को क्या पता , न तो भूख का होश न प्यास का बस मन बार बार कान को ऊँचा करता कहीं से तो बानो की आवाज़ सुनाई दे। पूरी रात बीत गयी और बानो का कोई अता पता नही । उसके बाबा भी उसी सड़क किनारे उसका इन्जार करते रहे ।
जिस भीख के लिए वे यहाँ वहाँ भटकते थे अब वही भीख उसकी हालत देख लोग यूँ ही दे जाते पर अब वह भीख भी उठायी नही जाती । अब तो मन उसके बाबा का बानो में था दिन दिन भर कभी सड़क पर तो कभी पुलिस थाने में बीत जाता कभी कोई पुलिसवाला कुछ खिला देता तो बानो को देखने की चाहत में थोड़ा सा उसके बाबा खा लेते। एक हफ़्ता यूँ ही बीत गया और अगले दिन उसके बाबा के पास ख़बर आयी कि बानो मिल गयी मानो उसके बाबा को आंखें मिल गयी दौड़ता भागता कभी गिरता कभी संभलता वो पुलिस थाने जा पहुँचा। जहाँ उसके कान अपनी बेटी की आवाज़ सुनने को मचल रहे थे उसका माथा चूमने को कर रहा था वहाँ उसको छूने मिला तो उसका पार्थिव शरीर , जिसको एक हफ्ते से कुछ मनचले लड़को ने मिलकर उजाड़ दिया।
ज्यों ही उसके पिता ने उसके शरीर को छुआ मानो उनकी खुद की जिन्दगी खत्म हो गयी उन्हें जब पुलिस इंस्पेक्टर ने बताया कि बानो जब पानी लेने गयी तब कुछ लड़को ने उसका अपहरण कर लिया और एक हफ्ते तक उसके साथ ज़ुल्म किये, ये सब वह ज्यादा न सह पायी और कल जब हमें बानो मिली तो तब तक वह मर चुकी थी । जो कान उसकी आवाज़ सुनना चाहते थे , वो उसकी मौत का समाचार सुन रहे थे न जाने कितने सवाल थे उस मन मे जिसकी आंखों का तारा , उस अंधे की लाठी को छीन लिया था । हज़ारो सवालों में बस एक सवाल ही उस बूढ़े ने पूछा, "क्या आपने उन लड़कों को पकड़ लिया है?" तो मैं उन्हें बस छू कर पहचाना चाहता हूँ ।जिन्हें उस मासूम की चीखों से उस पर दया नही आई । क्या कुसूर था मेरी बेटी का जो उसे ऐसी मौत मिली। उसकी बातों का शायद कोई जबाब किसी कर पास शायद था ही नही।

इतना कहकर वह पुलिस थाने से अपने अकेले घर मे चला गया ।

अगले दिन जब थानेदार साहब ने उसे उसकी बेटी का पार्थिव शरीर अंतिम क्रिया  केे लिए ले जाने के लिए हवलदार को भेजा । वहाँ पता चला कि अंधे बाबा भी रात को चल बसे बस ले गए तो मन मे हज़ारो सवाल जो ।

Wednesday, October 25, 2017

गलतियाँ हो रही हैं

गलतियाँ हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये

सीखे हुए हम घोड़े नही
लहराती पकी फसल न सही
नादान है कच्ची मिट्टी की तरह
प्यार से ही ढ़ाचे में ढाल तो दीजिये

कटु शब्दों के तीर से
विचलित होता है मन
कुछ मीठे गीत गाकर
इसे मना तो लीजिए

गलतियां हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये।

हम तो ना कारा
अशुध्दियों से भरे हुए
फलदार वृक्ष की तरह
धैर्य लेकर ही
सही ज्ञान दे ही दीजिए

गलतियां हो रही हैं
सीखने का जुनून भी है
सिखाने वाले ज़रा मुस्कुराकर
फ़रमा तो दीजिये।।
                        ~प्रियंका"श्री"
                           25/10/17

Tuesday, October 24, 2017

विश्वास

धुंध में चलते हुए
सब अंधकारमय दिखने लगा
घबराता मन ललखड़ाते कदम
थमने को यूँ कहने लगा।

डरे हुए नयन जब
होने लगे बन्द
अहसास कुछ
यूँ मन को छू गया।

कह गया मुझसे वो यूँ
कर विदा डर
अपने मन का
खोल पट दोनों
नैनों के।

शंसा न कर
रख विश्वास दृढ़
है ईश्वरीय अंश
तुझमे भी कही।

बंद नयन यूँ खुल गए
ठहरे कदम यूँ चल गए
धुंध में भी
प्रकाश ज्योति पुंज
कुछ यूँ दिखा
मानो परमात्मा थामे हाथ मेरा
मुझे आगे बढ़ चला।।
                    ~प्रियंका"श्री"
                      25/10/17

नारी

नारी सहनशीलता ,ममता की देवी
अपिरिचित अपने अस्तित्व से
जन्म से जुड़ा पिता का नाम
विवाह पश्चात जानी पति नाम से
कुछ नही उसका कुछ अपना
फिर भी सब कुछ संजोया जानकर अपना
जिन माता पिता ने पाला पोशा
उस पर भी न हक़ है उसका
हर वक़्त कहि जाती है वो
अमानत है तू किसी ओर के घर का
जिस घर व्यहि गयी बड़े चाव से
उस घर भी परायी कहलाई
जीवन पूरा दे दिया जिस घर को
अंत समय तक भी वो इज्जत न पायी
महान है ये रूप ईश्वरी
सब सहकर भी करती गयी।।

Saturday, October 7, 2017

मन की बात

बहुत वक़्त बाद आज मेरी सहेली निशा का काल आया और उसकी बाते आज मन को बहुत चुभ गयी ।बात ये है कि मेरी सहेली की शादी को पूरे 10 साल हो चुके है कहने को तो उसकी शादी आधी लव और आधी अरेंज थी। पर उसकी शादी में लव क्या था उसका आज तक मुझे पता नही चला । क्योंकि मेरा मानना है कि तकरार हर रिश्ते का एक पहलू है पर उसमे प्यार होना भी उतना ही जरूरी है पर जहां सिर्फ तकरार हो और प्यार सिर्फ रात का हो तो मुझे नही पता इसे कोन सी मेर्रिज कहते है मेने काफी लोगो को कहते सुना है कि कोई जानवर भी जब हमारे घर मे 1 साल रह जाता है तो हम उससे प्यार करने लगते है। पर जब बात किसी स्त्री की आती है जो अपना सब कुछ छोड़ कर अपने पति के भरोसे अपने ससुराल इस सोच में आती है।कि कुछ भी हो जब भी कुछ गलत होगा तो घर के बड़े और मेरे पति तो साथ होंगे ही।और सही का साथ भी देंगे ,मुझे मेरी गलती पर दांत भी जयरग पर अगर गलती पति या घर के किसी ओर सदस्य की होगी तोभी उनको भी वही सजा मिलेगी जिस पर मेरा हक भी होगा। पर क्या गुजरती होगी उस नारी पर जिसे एक जानवर से भी कम आंका जाए। जिसे सिर्फ अपने इस्तेमाल की वस्तु समझ जाएं ।या यूं कहूँ,की बहुत सारा पैसा और समान साथ मे लेकर आने वाली नौकरानी। हम एक जानवर को अपना मान सकते है पर उस लड़की को उस नारी को नही जिसे हम खुद अपनी पसंद से लेकर आये है।क्यों क्योंकि वो किसी दूसरे की बेटी है क्योंकि वो कभी कभी अपने माता पिता से मिलने की जिद करती है क्योंकि अपनी सारी जिमेदारियो को निभाने के बाद भी उसे ताने मिलते है और जब तक उसकी सीमाएं होती है वो फिर भी चुप रहती है  ओर सीमाएं टूटते ही जबाब देती है क्योंकि वो ससुराल बालों के हिसाब से नही चलती .....
ऐसे दिमाग बाले लोगो से मेरी एक ही दरख्वास्त है
आपके घर मे पल कुत्ता भी आपको काट लेता है जब अप्प उसे जरूरत से ज्यादा परेशान करते हो फिर वो तो सोच समझने वाला इंसान है उसकी भी सीमायें है जब गुसी में आपका बीटा उसकी पत्नी पर हाथ उठता है उसे सबके सामने जलिक करता है तब ये समझदारी कहा जाती है अतः निवेदन है कि आपके घर आई किसी ओर की बेटी से अपेक्षा करने से अच्छा पहले आप उसकी अपेक्षायो पर खरे उतरे । उसको वो प्यार वो सम्मान देकर तो देखे फिर भी बात न बने तो एक बार उससे बात तो करे पर तरीका सम्मान जनक हो क्यों कि ये बात हमेसा ध्यान देने योग्य है कि "हमारी इज्जत हमारे हाथ" ।अगर हमने बात करने का सलीका खोया तो बड़े होकर जो भूल हो गयी। उससेे आपके छोटे आपको काफी  देर तक बड़े होने की इज्जत तो दे पाएंगे । पर ज्यादा देर तक नही ।उसे अहसास तो दिलाये की जिस घर वो आयी है वो उसका ही घर है उसे जहां घर की बहू होने की जिम्मेदारियाँ निभानी है वही बेटी का होने का फर्ज दोनो घरो में भी पूरा करना है और इस सफर मैं वो अकेली नही उसका हमसफर हमेसा उसके साथ है । आपने कभी एक टायर पर गाड़ी को चलते देखा है या बिना माचिस दिए को जलाते ।बिल्कुक इसी तरह पति पत्नी का रिश्ता भी है जो एक दूसरे के साथ, प्यार ,सम्मान, विश्वास और त्याग के बिना अधूरा है जो ये बाते जितने जल्दी जान जाए बो सही बुद्धिमान व्यक्ति है क्योंकि अज्
आज के युग का एक बहुत अच्छा स्लोगन है जैसा करोगे वैसा भरोगे .....तो सोच समझ कर किया काम हमेसा सफलता दिलाता है अतः निवेदन है अपने घर लाये बहु से वैसा ही व्यहार करे जैसा वो आप सब से चाहती है जैसे आपकी संतान को कष्ट होता है तो पीड़ा आपको होती है जरा सोचो वो तो किसी ओर की बेटी अनजान लोगों के बीच अपना सब छोड़ आए है इस नई दुनिया को अपना बनाने। क्या .?.......हमारी आत्मा हमे उसे कष्ट देते दर्द महसूस क्यों नही करती ।क्या हुन सच मे इंसान है जरा सोचिए और अपना स्वंम का आत्मनिरीक्षण कीजिये।।
                                                  ~प्रियंका~"श्री"
                                                     7/10/17
                                                       23:32

Friday, October 6, 2017

मां बनने का अहसास

वो पता चलना
तुम्हारे आने का
गुदगुदा गया दिल को
बड़ा गयी थी
धड़कने दिल की
भर गई थी आँखें
खुशी के आँसूओ से
बदलने जो वाली
थी जिंदगी मेरी
वक्त दर वक्त जब
अहसास हुआ मुझे
तुम्हारी पहली छुअन का
कही न कही
धबरा गयी थी मैं
अनुभव था पहला मेरा
समझ भी छोटी थी
बस चाह बड़ी लिए
सब सह रही थी मैं
मेरा मातृत्व सच्चा था
न जाने क्यों बताने
को मचल रही थी मैं
वक्त वो जब आया
हर दर्द सह कर
तुम्हे अस्तित्व में
जब पाया।
न थमे आंखों से आँसू
न गयी होटो से मुस्कुराहट
जब लिया था गोद मे
पहली बार तुम्हे
खुद से ही डर गई थी मैं
डर था । न कोई
तकलीफ दे दु तुम्हे
आख़िर मां जो बन गयी थी मैं।।
                         ~प्रियंका~"श्री"
                           6/10/17
                              23:43 pm

Thursday, October 5, 2017

मन की बात

आज फिर उसने बोला मुझे स्कूल नही जाना ।आपकी याद आएंगी, उसकी ये बात मन में मेरे कई तरह के भाव जगा देती ।एक तरफ जहां मन खुश होता कि मेरी बेटी मुझे इतना प्यार करती है ।वही दूसरी तरफ दुखी होने लगता कि मेरा लाड दुलार कही उसकी आगे आने वाली जिंदगी में रुकावट न बन जाये। फिर सोचती कही स्कूल में उसे कोई परेशानी तो नही ।हजारो तरह के ख्याल मन मे आते । पर सब को एक तरफ कर उसे समझाती ,उससे पूछती ,कुछ अपने मन को ,तो कुछ उसके मन को हल्का करती। और उसे स्कूल भेजने के लिए गेट तक जाती ।पर हद तो जब होती ,जब बो मुझे देखे बिना ,मुझसे टाटा किये बगैर ही स्कूल के लिए अपनी बस में बैठ चली जाती ।उस वक़्त मन अंदर से टूट जाता ।रोने के अलावा कुछ नही आता समझ मे। ओर पूरा दिन इसी चिंता मैं जाता, मेरी बेटी ठीक होगी न , कही रो न रही हो ।अपनी काम बाली का दिमाग कहकह कर खा जाती । बस यही बात पूछती रहती ,वो ठीक होगी न , ऐसा क्यों करती है कही में उसे ज्यादा लाड प्यार तो नही कर रही ।अपने पति को कॉल करके परेशान करती ।उसके बारे में बार बार प्रश्न पूछती ओर चाहती कि सब उत्तर भी वैसा ही दे जैसा मन चाहे। मैं जानती हूं मेरा ऐसे करने की एक वजह ये भी है कि कुछ समय बाद जब वह अपने हर छोटे बड़े काम के लिए मुझ पर आश्रित नही होगी तो मेरा जीवन कैसा होगा। शायद यही सोच मुझे अभी उसके साथ उसका हर पल जीने को मजबूर करती है ।पर एक माँ होने के नाते मुझे अपनी सीमाएं भी बाधिनी होगी ताकि मेरा बच्चा मेरे सानिध्य में अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीना भूल न जाये क्योंकि कहते है ना ,जब तक बड़े होते है बच्चे अपनी गलतियों से या अपने खुद से कुछ नही सीखते ।मैं नही चाहती उससे कोई गलती हो। पर हा उसे सीखने के लिए ,करना तो होगा क्योंकि बिना किये कुछ नही मिलता हां कभी कभी लगता है हम माये थोड़ी सी मतलबी तो होती है अपने बच्चो के लिए । पर जब बात उनके भविष्य की हो तो भी हम हर तरह सोचने को ,करने को भी तैयार हो जाती है।।
                                         ~प्रियंका~"श्री"
                                             5/10/17

लौट आओ माँ

लौट आओ माँ

मां जब भी
याद आती है तुम्हारी
आंखों में आँशु आ जाते है

वो वक्त याद आ जाता है
जब कभी साथ होता था तुम्हारा
मन बेचैन हो उठता है
आंखे तलाशने लगती है

तुम्हारे एक अहसास को
पाने को मन मचल उठता है
हर जगह ढूढता हु तुम्हे
न पाकर फिर मुरझा जाता हु

पर तुम भी तो मां हो
न होते हुए भी
एहसास जान लेती हो
ठंडी हवा के झोंके से
अपने आँचल में समा लेती हो

कर देती हो दूर
मेरे अंदर की बेचैनी
दे देती हो सहारा मुझे

उस वक़्त पास न होकर भी
पास पाता हु तुम्हे

काश वो पल न आया होता
तो आज पास होती मां मेरे
तुम्हारा साथ होता
याद न होती साथ मेरे
संभव हो तो लौट आओ मां
तरसता तू प्यार को तेरे।।

                 ~प्रियंका~"श्री"
                   5/10/17

Wednesday, October 4, 2017

किताब (बच्चों की कविता)


रंग बिरंगे पन्नो वाली
पढ़ने को जब आती है
तरह तरह का ज्ञान ये
हमको दे जाती है

तरह तरह के चित्रों से ये
कितना हमको लुभाती है
पढ़ पढ़ कर मन नही भरता
जब ये दोस्त बन जाती है

बात यही श्री है कहती
दोस्त है ये सबसे अच्छी
मान लो बच्चों मेरी बात
रखना इनको सदा साथ
देती है ये हर मुश्किल में साथ
सबसे खूबसूरत होती है किताब।।
                         प्रियंका"श्री"
                         2/3/2017




शिक्षा का अधिकार

शिक्षा का अधिकार

दो अक्षर का शब्द ये ,
                          जिसमें अपार ज्ञान समाता है

इसके बिना न कोई नेहरू ,
                           न गांधी बन पाया है

वो बहुमूल्य धन है ये,
                  किसका भाव कोई आंक न पाता है

शिक्षा का अधिकार जो हम सब को
                                 बेहतर इंसान बनाता है

अपना अस्तित्व बनाने मे,
                               ये सहयोग पूरा करता है

क्या होती है गुरु की शिक्षा,
                                    ये हमको बतलाता है

शिक्षा का अधिकार जो हम सब को,
                                      बेहतर इंसान बनाता है

दबी हुई इंसानियत को,
                               इसका ज्ञान जगता है

ये ऐसा अधिकार है जो,
                                हम सब के मन को भाता है

शिक्षा का अधिकार है जो हम सब को,
                                      बेहतर इंसान बनाता है
                                             
                                             ~प्रियंका~"श्री"

मन का साहस

मन का साहस बांध कर
बस आगे बढ़ते चलना
न डरना ,न ही है ,घबराना
बिना फल चिंता किये
बस आगे बढ़ते जाना

रास्तों पर अवरुद्ध कई मिलेंगें
होगा शुरू कदम डग बगाना
संभालना है तुझे खुदको
गिरना ,उठना भी है तुझको

टूटने न देना साहस मन का
जिद में है कर गुज़रना
जब तक न मिले मंजिल
चलते कदमो को ना रोकना

एक दिन वो भी आएगा
मंजिल करीब ओर
रास्ता छोटा हो जायेगा
देखा तेरा हर सपना
अपने मुकाम पर आएगा

                    ~प्रियंका~"श्री"

भावनाएं

भावनाएं

क्या कुसूर था मेरा
                    क्यों मुझे यू ठुकरा दिया
न समझा इंसान मुझे
                मोल भाव बस्तु बना दिया

जब चाह थी ही न मुझसे तो
                क्यों अपने घर बुला लिया
बोल ही देते तुम सेवक इस घर की
                  बहू बना बस बिदा किया

सवालो का क्यों
                 अधिकार नही मुझको
बिन तीली लिए
                 हर शब्दो नेे जला दिया

हर रिश्ते को बनाने में
               खामोशी से हर गम भुला दिया
हर कोशिश हुई नाकाम
                 जो अपनो ने यू दगा दिया

भरोसा था खुद पर
                        तुम्हे तो मैने अपना बना लिया

टूट गयी उस वक़्त
                        थम गया अस्तित्व मेरा
जिसे दिल दिया
                    उसने तलाक थमा दिया

क्यों दिया उस मन को घात
                    जिसने परमेश्वर मान दिया।
                                        ~प्रियंका~"श्री"

मासूमियत का गुनाह

यह रचना उन मासूमो को समर्पित जिनकी आत्मा को रौंद डाला गया।
           मासूमियत का गुनाह
          क्या नही था, अधिकार ,
          मुझे जीने का,
          नए सपनें सजोने का,
          गलती थी ही, क्या मेरी ?
          न था,अधिकार तुम्हें,
          मुझे सजा देने का,
          सब कुछ लूट भी लिया मेरा,
          तो ,
          जीने तो,दिया होता,
          जब डर था ,
         कर्मो के फल का,
          न ऐसा ,
         कर्म किया होता,
          मेरी मासूमियत को तबाह कर,
          किस इंसानियत का,
          परिचय दिया तुमने,
          लहू लुहान किया मुझको,
          क्या कोई अपना ,
          नही दिखा मुझमें,
          एक नन्हा मासूम ही तो था,
          अपने मां पापा की,
          आंखों का तारा ही तो था,
          क्या मिला ?
         मुझे तबाह करके,
          उनकी आंखों में ,
         जीवन भर आँसू देके,
          जिस मां ने ,
         दिया था जन्म,
          उसे भी न देखने दिया,
          ऐसा क्या,
          गुनाह किया था,
          मैंने,
          जो मुझ पर रहम भी न किया।
                          ~प्रियंका~"श्री"

रचना और रचनाकार

रचनाकार ने कहा अपनी रचना से
         
है रचित मेरी रचना
तुझमे सब रस मैंने डाल दिया।

अब प्रतीक्षा है मुझको
तुझे किसने कितना भाव दिया।

तत्काल बोल पढ़ी रचना,
मैं तो रचित तेरे द्वारा,

अनभिज्ञ हूँ, मैं खुदसे
शब्द ताल सब है ,तेरे
मैं तो रची हूँ तुझसे,

पसंद करेगा जो मुझको,
वो गुणगान तेरा ही गायेगा,

मैं तो ,वो माला
जिसके मोती को स्वरूप
तुमसे ही आएगा।

भविष्य में भी, पहचान तुम्हे
मुझसे ही जाना जायेगा।

सुन रचित ,अपनी रचना को,
रचनाकार ने प्रणाम किया,
क्षमा करो, मेरी भूल,
जो मैंने तुम पर उपहास किया।
                   ~प्रियंका~" श्री "

इश्क़

हम बाशिन्दे है इश्क़ के ,
इश्क ही अपना मजहब
इश्क़ ही, है खुदा ,
और यही खुदा की इबादत
इश्क़ करो इस जग में
जो दिल से तुम्हे अपनाए
सबसे पहला इश्क़ तो
मां के अधिकार ही आये
गर है सच्चा इश्क़ तो,
ह्रदय मे ईश्वर समाए
इश्क़ की मीठी खुशबू से,ये
खुद भी अछूता न रह जाये।
जैसे सबरी ने राम को ,
भक्ति सागर में डूब के
झूठे बेर खिलाएं
प्रेम भक्ति में मीरा भी,
विष प्याला पी जाएं
राधा ने तो प्रेम के
ऐसे दीप जलाये
श्याम भी देखो अब
राधे श्याम कहलाये
जो इससे अनभिज्ञ रहे ,
जग सार वो समझ न पाए
जैसे बिन पानी के ,
प्यासा जीवन अतृप्त रही जाएं
इश्क़ से बढ़कर कुछ नही
जो बात ये समझ जाएं
काहे का कोई पाप हो
सब जग शांति समाये।।
               ~प्रियंका "श्री"~
                26/9/17

Tuesday, October 3, 2017

मन का संवाद

मन में चल रहा संवाद जिसने भारत माँ को भी माँ कहने पर आपत्ति जताई है । वो संवाद कुछ इस तरह के है।

मत कहो मां मुझको
         जब बदहाल किया मेरे रूप को।

न किया उसका सम्मान
          रोद दिया उसको।

मेरी जय कहते हो
         घर ,बाहर उसको दंड देते हो।

नारी ने नर जन्म दिया
        तुम पर सर्वस्व लुटा दिया।

हर एक रूप के अस्तित्व को
            तेरे लिए मिटा दिया।

पर जब मांगा अपने लिए
        नर ने उसे ठुकरा दिया।

न दिया मां को सम्मान
        न पत्नी को प्यार दिया।

न बहन के ख्वाहिशों
       को उड़ने का साहस दिया।

मार दिया अपने हाथों
       जिस बेटी को जन्म दिया।

नर ने अपने नर अहम में
       नारी मन अनुभूति को जला दिया।

नारी की शक्ति के बिना
      तू जग में कुछ भी न रह जायेगा।

क्यों नही समझता ये नर
      तेरा अस्तित्व ही मिट जाएगा।

जब तक शक्ति है सहन की
      सब सहन कर जायेगी।

मत करना अपनी सीमा पार
        वरना चण्डी बन जाएगी।

अगर है बुद्धि तुझमे
        कह रही ये कवि।

सँभल जा जो अगर
           है प्यारा तुझे अपना जीवन यही।

प्रियंका"श्री"








कविता

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